बुधवार, 2 दिसंबर 2015

सृजन के सरोकार

सृजन के सरोकार
              
अमित कल्ला 
         

एक कवि और चित्रकार होने के नाते अपने काम में निरंतर लगे रहना बेहद सुखदायी होता है कागज़ पर लिखी गयी नयी कविता और कैनवास पर रंगसाज़ी दोनों ही मेरे लिए ऐसे अतीन्द्रियदर्शी सुकोमल अनुभव हैं जो यकीनन शब्दातीत हैं । अक्सर जब अपने अन्य साथी कलाकारों से इस मसौदे पर बात होती है तो पता चलता है कि  हम सभी कलाकारों की वैविध्यता भरी कला भाषा का व्याकरण एक ही है अपनी.अपनी प्रार्थनाएं होने के बावज़ूद अनुभव के स्तरों पर भी अमूमन गहरी समानता है मसलन अनुभूति के आधारों पर कलाओं की इन विभिन्न धाराओं के बीच अभिन्न तालमेल और अन्तर्सम्बन्ध हैं  चाहे वह दृश्य कलाओं की बात हो अथवा प्रदर्शनकारी यानि परफॉर्मिंग आर्ट जी हाँ कला और कलाकार के, बीच होने वाला वह संवाद सबसे महत्वपूर्ण है और आखिर में उसका यथासंभव बचे रहने में उसकी सबसे बड़ी सार्थकता है ए लिहाज़ा जिसके भीतर सच और सहजता का अनुपम वास है ए जो सबके अपने अपने व्यक्तिगत स्वभावानुसार भी है।

हमारे समाज में कला और शिल्प इन दोनों ही विषयों के बीच प्रमाणिकता प्रासंगिकता और रचनात्मकता के स्फुरणों को लेकर भारी मतभेद हैं परस्पर दोनों के धरती और आकाश एक ही हैं किन्तु विकास की वैचारिकी में बहुत अंतर हैं कमोवेश मोटे तौर परदोनों ही कला के अनन्य रूपक हैं जहाँ सतत अपने काम में लगे रहने की ज़रूरत होती है जिसके दौरान कभी कभी कुछ सवाल भी खड़े होते हैं इन सबके बीच मन अपने होने के मायने खोजने लगता हैए जिसका तात्पर्य आत्ममुग्धता से कदापि नहीं है अपितु यहाँ एक ऐसा परिशुद्ध विचार है जो अव्यैक्तिकता के सोपानों को छूना चाहता है जिसकी मंशा अपने भीतर के दायरों को खोलने की है । जिसकी गतिउर्ध्व और अधो दोनों ही है जो एक दूसरे के सवालों से सवाल बनाते दीखते हैं ऐसे में एक सवाल बार बार सामने आकर खड़ा होता है वह यह कि कलाकार होने के असल मायने क्या हैंए बुनियादी तौर पर दुनिया में उसका होना क्या और क्यों हैं । उदाहरण केलिए चित्रकला के सन्दर्भ में अगर हम बात करें तो किसी स्तर परकोई भी कह सकता है की वह चित्रकार है और पेंटिंग करना उसका काम है उसके बनाये गए चित्र के द्वारा बड़ी आसानी से उसकी प्रासंगिकता को रेखांकित किया जा सकता हैए क्या इन्ही तमाम बातों में एक कलाकार का होना छिपा है या फिर कुछ अन्य सतहें भी है जिन्हें जाँचना परखना बेहद आवश्यक है । मुझे लगता है कि कलाकार होना अपने आपमें बड़ी जिम्मेदारी भरा सबब हैए स्वयं एक कलाकार के लिए भी जिसे अपने होने को आधा.अधूरा जानना एक ग़फ़लत हैए इस क्रम में प्रसिद्ध जर्मन मनोविज्ञानी गेस्टॉल्ट और उनके बताये प्रत्यक्षीकरण का सूत्र याद आता हैं जहाँ वे ष्वितउ अथवा चमतेवदंसपजल ंे ूीवसमष् का ब्यौरा देते हैं। सही अर्थों में एक सच्चे कलाकार का समूचा जीवन ही कलामय होता है जहाँ कला मेंजीवन या फिर जीवन में कला इस जुमले में फर्क कर पाना बहुत मुश्किलों भरा सबब है । निश्चित तौर पर किसी भी साधारण इंसान का कला को चुनना ही अपने आप में असाधारण.सा कृत्य हैए चाहे उसका ताल्लुख किसी भी विधा अथवा फॉर्म से होए यह चुनाव ही दर.असल अपने आपमें बड़ी चुनौती है ए एक देखी अनदेखी तीखी तड़प को अपने साथ सींचती हुयी चुनौती जहाँ प्रतिपल कुछ नया सृजन करनेकी आकांशा हैए स्थापित लकीरों को मिटाने की चाहत के साथ अंतर्मन की उथल पुथलए जिसकी समाज में स्थापित मूल्यों से टकराहट है ए निरंतर कुछ नया रचने की उत्साह भरी जुम्बिश ए जिसमे रचना प्रक्रिया के माध्यम से देश और काल सरीखे पैमानों के पार जाने की ताकत है।

कला कभी भी एकांतिक नहीं हो सकती चाहे वह किसी भी स्वरूप में क्यों न होए उसकी अपनी सामाजिकी जरूर होती हैए अपने परिवेश से जुड़ते संस्कार और सरोकार अवश्य होते हैं जो कि कलाकार के माध्यम से अनेक रूपाकारों में अभिव्यक्त होते हैंए रचना की प्रायोगिक भिन्नता ए व्यक्तिगत अभिव्यक्ति का उसका एक दूसरे से अलग होना इस पूरे क्रम में सौंदर्य का पर्याय हैए जिसके मर्म की संवेदनशीलता को जल्द से जल्द समझ जाना और उस भिन्नता का सम्मान करना एक संवेदनशील समाज के लिए भी बेहद जरुरी है। कलाकार का अंतःकरण  सदैव आंदोलित रहता है चेतन.अचेतन रूप से जिसकी सुनिश्चित अभिव्यक्ति उसके काम में साफ़ नज़र आती है जिसका आधार जीवन ही हैए ये बेशकीमती जिन्दगी और उससे जुड़े फ़लसफ़े, बेशक उसके रूपांतरण में सृजनकर्ता का अपना अपना तरीका हो ए जिसका सरोकार कलाकार की अपनी निजता और स्वतंत्रता से हो।


कहते हैं जो सहता है वही रहता है ए कलाकार के  जीवन में इस सहने के कई अर्थ होते हैं जिससे गुज़र कर उसके विचार और उसकी कृति असल पकाव को पाते हैं ए ये सहने का दौर अनंत तकलीफों के साथ.साथ बड़ा रोचक भी होता है ए बारम्बार जहाँ खुद को गढ़ना और बिखेरना एक सतत प्रक्रिया का हिस्सा हो जाता है और क्रमशः उसकी जिन्दगी का भी अंतरंग हिस्सा । आज पूरी दुनिया को यह दिखने लगा है कि विज्ञानं अपने अंतिम पड़ावों पर है ए मानवीय सभ्यता उसकी संगति की सीमाओं को छू कर अपने मूल नैसर्गिक स्वरूप में लौटना चाहती है ए जिसे अपने दामन में ठहराव लिए कलाओं के सहारे की ज़रूरत है ए सच्चे  लेखकए कवि, कलाकारों की ज़रूरत है जो जीवन में फैले बेरुख़ी के बारूद को बे.असर करके कल्पना और यथार्थ के बीच साँस लेने की गुंजाईश पैदा करे उनअंतरालों को गढ़े जहाँ इस दौड़ती भागती दुनिया में कोई भी कुछ देर ठहर सकेए अपने भीतर उठते उन स्वरों को सुन सके ए अपने मन की कह सके जहाँ अधूरे में चाह हो पूरा होने की ताउम्र भटकता रहे वह रंगत पाने को बिन जाने ही उस पूरे पर मुक़र्रर अधूरे को ।  


1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (04-12-2015) को "कौन से शब्द चाहियें" (चर्चा अंक- 2180) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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