गुरुवार, 25 सितंबर 2014

सार संकल्प संसार

                               
                    सार संकल्प संसार 


दुनिया में कुछ भी अप्राप्य नहीं,
एक वैरागी संकल्प बाद 
कुछ भी नहीं…    
         
हमारे जीवन में संकल्प का विशेष महत्व है, जिसकी अवधारणा कई - कई स्तरों पर बखूभी परिभाषित की गयी है। संकल्प करना या फिर संकल्पमय होना अपने आप में एक विशिष्ट रास्ते की ओर बढ़ाया गया कदम है, जो किसी आध्यात्मिक अनुभूति से कम नहीं जान पड़ता, संकल्प परोक्ष - अपरोक्ष   रूप से मनुष्य मन द्वारा देखे गए स्वप्न को साकार करने का अनुपम सोपान है, भगवत गीता में भगवान श्री कृष्ण, विषाद ग्रसित अर्जुन को संकल्प लेकर एक निश्चय बुद्धि वाला बनने की बात करते हैं जिसका अगला पड़ाव स्थितप्रज्ञ होना है, हालाँकि ऐसा होना सौ प्रतिशत उस धर्मक्षेत्र की रणभूमि कुरुक्षेत्र में होने वाले बड़े प्रयोजन का हिस्सा भर है। 

आज का हमारा जीवन भी उसी इतिहास की प्रतिकृति है, वस्तु स्थिति,स्थान और पात्र भिन्नताओं के अलावा मनानुभवों के स्तरों पर सबकुछ ठीक वैसा ही है। हमारे इस मन में दृश्य और दृष्टा सामानांतर रूप से अपनी मौजूदगी दर्ज़ करवाते हैं जिसमें कृष्ण और अर्जुन रूपी दोनों ही शक्तियों का वास हैं, तनाव के क्षणों में जो हमें समता बनाये रखने को प्रेरित करते हुए हमारे संकल्प को गहराई तक रचनात्मकता और सकारात्मकता की अमृतधाराओं से सींचते हैं। 

संकलप की अपनी  सौंदर्यात्मकता (Aesthetics ) भी है, वह शुभकारी और दिव्य है उसे कामना यानि इच्छा या फिर (Desire )  समझना उसकी महत्ता को कम आंकना होगा वह तो साक्षात मनुष्य मन के फलक पर मन द्वारा ही कोरित रचना है, जिसका परिकर अत्यंत विशाल है जहाँ व्यष्टि और समष्टि दोनों का संवाद सुनिश्चित है, कामनाएँ हमें जीवन के विभिन्न स्तरों पर गिराती हैं जबकि संकल्प नित्य निरंतर प्रगति की ओर ले जाता है उसमें जीवन को ऊपर उठाने की ताकत होती है। संकल्प, कर्तापन भाव के लेश मात्र अंश से रहित होता है जिसकी संज्ञा उसके होने होने से परे है, उसकी आधारशिला समत्व के सिद्धांत पर टिकी होती हैअपूर्ण रहने की अवस्था में भी वहाँ अन्तर्लयी पूर्णता का वास है उसे साधने वाला अथवा उसे धारण करने वाला किसी एकनिश्चित बुद्धि वाले योगी से कम नहीं है। 

हमारे लिए कामनाओं के बदले संकल्प का दामन थामना ही श्रेयस्कर है जिसकी पूर्णता हेतु पूरा का पूरा निसर्ग हमारा सहयोगी होता है, उसकी दिशा में जब हम एक कदम बढ़ाते हैं तब प्रकृति हमारे लिए हज़ार कदमों के मार्ग को स्वयं प्रशस्त करती दीखती है। 

अमित कल्ला 
स्वतंत्र लेखक / चित्रकार 
amitkallaartist@gmail.com


1 टिप्पणी:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (27-09-2014) को "अहसास--शब्दों की लडी में" (चर्चा मंच 1749) पर भी होगी।
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    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    शारदेय नवरात्रों की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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