सोमवार, 16 जून 2014

अज्ञात को ख़त

अज्ञात को ख़त एक असल स्वीकृति है, निश्चित ही उस अनदेखे पर जताया गया गहरा विश्वास, यक़ीनन उसकी उपस्थिति ही उसकी सज्ञान अनुमति का ज्ञातमय स्वरुप है जो इन असंख्य नामरूपों में किसी दिव्य कविता सी अपने होने को सार्थक करती है और अपने न होने के अस्तित्व को जग विक्षोभ से सिलसिलेवार मुक्त।

हमारे यहाँ अज्ञात के कई अर्थ व उपमाएं हैं कई तरहों कि वैचारिक धाराओं के प्रवाह से उसका सीधा सरोकार भी स्पस्ट दिखायी पड़ती है जो हमेशा ही अपनी नैसर्गिक सार्थकता के साथ देश - काल कि सीमा सत्ताओं पर अपने गहरे हस्ताक्षर उकेरते हैं। हम सभी के लिए जिन्हे पाना और पाकर खोना दोनों ही किसी रोमांच से कम नहीं, वे इस जीवन यात्रा का न केवल गहन हिस्सा भर हैं बल्कि समूचा भव उनके ही इर्दगिर्द रचाबुना तानाबाना है।
अज्ञात का अपना संगीत है, उसके रंग, उसकी रेखा, उसका आकार है, उसकी अपनी लय भी है जिसका सीधा सम्बन्ध हमारे मनोमय भावों संग अत्यंत बारीकी से जुड़ा है, अज्ञात वास्तव में आविष्कार या किसी अन्वेषण का रूपक ही जान पड़ता है, सुनहरे रुपहले भविष्य को छूता टटोलता।
जी हाँ इस मुल्क कि माटी का कण-कण भी ऐसे ही अज्ञात का मुरीद है, मार्गी और देसी दोनों ही धाराओं में जो सहसा उपस्थित है, ऋषि भृगु, नचिकेता, उद्दालक से लेकर हमारे कबीर, नानक, नामदेव, तुका, चोखा अथवा निवृति सभी किसी न किसी रूप में उसी अज्ञात को ज्ञात होता पाते हैं, सूफ़ी संतों के यहाँ तो उसका ताल्लुख और ज्यादा गहराता दीखता है, फ़कीरों, दरवेशों के काफ़िले उसी एक अज्ञात के दीदार को खोजते फिरते नज़र आते हैं.……।


ऋत अर्थात सृष्टि की वह सनातन लय जिससे अंश - अंश चलयमान है जो सत्य का साक्षात प्रतिनिधित्व है यह अमूल तत्व भी उस अज्ञात के फेरे से अछूता नहीं है। हमारे लिए बहुत – सा सत्य ज्ञात और अज्ञात के बीच मौजूद है जिसे दर्शन की भाषा में प्रमाण भी कहा जा सकता है जिसमे बड़े पैमाने पर यूनिवर्सल ट्रुथ सम्मिलित है।  जैसे, अगर हम विज्ञान को ज्ञातज्ञान का सबसे बड़ा आधार माने तो दिन और रात की निजता पर बड़े सवाल किये जा सकते हैं, विज्ञान के अनुसार सूर्य का उदय और अस्त होने की प्रक्रिया से कोई सरोकार नहीं है वहाँ ना तो रात है और ना दिन, लेकिन हमारे लिए उनके मायने हैं, निसर्ग में उनकी अपनी एक सत्ता है जिसे हम कंडीशनल ट्रुथ के रूप में सहज स्वीकार करते हैं। 

बृहदारण्यक उपनिषद और अवधूत गीता जहाँ उस आत्मतत्व के सम्बन्ध में " न इति " माने नेति नेति  कहती है तो वहीं बौद्ध मान्यताएँ उसे महाशून्य के रूप में उस अज्ञात की काया के रूप में परिभाषित करती है। यह अपने आपमें एक अत्यंत रोचक विषय है और उससे संवाद करके व्यक्तिगत अनुभव के स्तर पर अर्थ कायम करना एक बड़ी चुनौती जान पड़ता है जहाँ भ्रमित होने की संभावनाएं कहीं ज्यादा है क्योंकि वह प्रत्यक्ष, अनुमान और परंपरागत प्रमाणों से परे ही है, हाँ शब्दप्रमाण में उस व्याख्या की व्यंजना जरूर मापी जा सकती है। 

अक्सर रचनाकार अपने अनुभव व स्मृतियों के आधार पर सृजन यात्रा में आगे बढ़ते दीखते हैं जिनकी कल्पनाओं का कैनवास दृश्यगत विस्तार की सीमाओं को छूने के बावज़ूद भी किसी न किसी रूप में सिकुड़ा रह जाता है, वे संकुचित परिकर की दहलीज़ों को नहीं लाँघ पाते लेकिन उस अज्ञात की स्तुति उससे किये गए सुकोमल संवाद, उसको लिखा गया हर एक खत निश्चित तौर विचारशीलता के सार्थक सोपान रचने में सहयोगी होता है। अनायास गठित आकृतियां जब अपने आपको रेशा रेशा खोलती हैं अपनी ज्ञात काया के निकाय को उसी अज्ञात में पूरा होता पाती है जो अपने आपमें उसकी सम अवस्था की पूर्णता की ओर गहरा इशारा है। 

अज्ञात का संग उस वास्तविक पूर्णता का पर्याय है जिसे हम सभी अलग अलग नाम रूपों में पाने को प्रयासरत रहते हैं जिसका रास्ता ज्ञात से होकर ही गुज़रता है, ये ठीक वैसा ही है जैसे साकार में निराकार निहित होता है। आदिशंकराचार्य द्वारा लिखित दृगदृश्य विवेक में ऐसे तमाम मसलों पर बड़ी सटीक विवेचना की गयी है दृष्टा और दृश्य के बीच के उस सम्बन्ध की सार्थकता पर प्रकाश डाला गया है जिसमें उस अज्ञात के अंश ज्ञात तत्व में स्थायी भाव से वास करते हैं । अज्ञात का सौंदर्य भावातीत है, मौन की मात्राएँ उसके अंतर संगीत के स्वर हैं, कभी कभी उसकी उपस्थिति बूंद बूंद संवित विकल्प सी जान पड़ती है, ज्ञात ही उस अज्ञात का सम साक्षी है ।  


अमित कल्ला                           amitkallaartist@gmail.com

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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    आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (17-06-2014) को "अपनी मंजिल और आपकी तलाश" (चर्चा मंच-1646) पर भी होगी!
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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