गुरुवार, 6 जनवरी 2011

शुभ यात्रा

उसे भूलने में ही
भलाई है
सिर्फ लिखा जाता जिसे
कभी-कभी
कहा-
फिर क्या दिखाई पड़ता
इक नया दिवस
हाँ
बहुत अंतर है
पृथ्वी सा होने में
हवा
उसका क्या
शुभ यात्राएँ हीं

1 टिप्पणी:

  1. नमस्कार !
    अमित जी !
    नव वर्ष के आप को बहुत बधाई ! आप कि कविताए तो अच्छी ही होती है आप कि चित्रकारी कि तरह , मगर माफ़ी चाहुगा कि कही ये कविता अधूरी सी तो नहीं है , मगर है अच्छी , बधाई , साधुवाद .
    सादर !

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