AMIT KALLA
गुरुवार, 1 नवंबर 2012
भली - भली सी इक रात
अधूरे की
अपनी ही धुरी होती है
होता है उसका आकाश भी
अधुरा स्वयं को निगलता
निपजता उस पूरे को
जहाँ स्मृतियों की आकृतियाँ है
सिरहाने से फिसलकर
सुबह को लपकती
भली - भली सी इक
रात है ।
1 टिप्पणी:
संगीता पुरी
1 नवंबर 2012 को 8:33 pm बजे
भली भली से ..
अच्छी प्रसतुति
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