बुधवार, 26 अगस्त 2009

रणथम्भौर का राजा

हज़ार
दहलिज़े पार कर
चुनौती दे
आकाशीय मेहराबों को
फ़िर लौट आता है

नदी को चीर देता
पर्वत -पर्वत रौंद
आँखों से आग बरसा
आप ही
बनता -बनता है
धारीदार करता
लुकाछिपी
चौकन्ना
चौकाता कैसा
ये रणथम्भौर का राजा ।

कहाँ

कहाँ
विभाजित क्षितिज
कहाँ
विवर्जित माया
कहाँ
नैना सुरत सयानी
कहाँ
अगम
निगम का खेला
कहाँ

बिसर मुक्तिफल जाता
कहाँ
रेखाओ कई महानिद्रा
कहाँ
रंग संग बसेरा
कहाँ
भर
भर कंचन वर्षा
कहाँ
पानी को पानी से धोना
कहाँ
छाव को छाव से अलग करना
कहाँ
आख़िर एसा मेला ।

करवट - करवट

किसी
औघड़ की
काली कमली ओढ़
अपनी ही देह में
अंतरध्यान हो

पल- पल
कैसा सहारा देती है

मौन
के उस
सुरमई
संतुलन को
करवट - करवट ।

मंगलवार, 25 अगस्त 2009

कितना साफ़ ..

पिघलते अंधेरे के पार
गहराई चांदी की रेखा पर
टिके ख्वाब में
बची- खुची पीड़ा तक
या फ़िर
खाली कैनवास में
छिपे पहाडो पर
उगी घास ,

अटक जाता
जहाँ
सूर्य
कभी कभी
कितना साफ़ ।

खोजता पीड पुराणी

खोजता
पीड पुराणी,
माथा - पच्ची कर
कोई न कोई
वैकुंठ की यात्रा कर आता है

सिलखड़ी पर कोर देता
मन्त्रयोग ,
पंच से पंच का तात्पर्य ,
सिद्धांतो के संदेहों से पार
बाटकर सुनहरे बीज
दत्तचित्त हो
अंग और अंगी का
भेद बताता है

कौन बडभागी
ब्रह्मज्ञान की बात करता ,
गुदगुदाता
ज्वारभाटों को ,
विरह के बाणों को
नयनों में समा

आकाश पर मेघ
पृथ्वी पर जल
रहँट पर कौतुहल
बिखेर देता

अखंड ध्यान लयलीन
अपने ही साहिब मै
विख्यात होता है
प्रतिषण
कोई न कोई
खोजता है
पीड़ पुराणी ।

सोमवार, 17 अगस्त 2009

कृष्ण और शुक्ल के मध्य

कृष्ण और शुक्ल
के मध्य
सुझाता
श्रुतज्ञान,

कहाँ
मन मछली गंतव्य
कहाँ
अलबेला ऋतुफल

देखो
अर्ध्य चढाते उन देवताओं को,
भौमश्ववीनि योग में
तरने - तारने को तैयार

दिशाएं शिलाओं पर
सुस्ताती
देहमुक्त महाकाव्य की
उपासनाओं से थकी,
समुच्य का विधान दोहराती है

अभिमान मत करना तुम
सिद्धवस्तु,
जमातों की जमात,
नेत्रों में किरणों के पुंज भर
चढ़ते आकाश पर रहना

हज़ार- हज़ार
सागर की आयु वाले
तुम ही स्कन्द
तुम ही इन्द्र
अग्नि , आकाश,
काल ,यम्,
अमृत
तुम ही हुत,
अथर्व , दत्तरूप,

गरजो
गरजो
रुद्र... बन तुम

कृष्ण और शुक्ल के मध्य
जहाँ
सुझाता कोई
इक और
श्रुतज्ञान ।

शनिवार, 6 जून 2009

रेखाओं की देह विस्तृत होती हैअनन्य रहस्यों को खोलती - बांधती , जोड़ती - तोड़ती , कितना प्रभावित करती हैसमुद्र में लहर , धरती पर नदी , रेत , लम्बी यात्रा हो जातीस्मृतियां रचती - रचाती जीवन की धुरी हो गहराने लगती है , चित्रकार इन्ही रेखाओं को पकड़ रचता है विलय के अर्थ , जाग्रत कल्पनाओं को अपने गंतव्य तक पहुचाता है । आख़िर कहाँ से आती ये रेखायें ... कैसे निपजती , कहते हैं बिन्दु -बिन्दु जुड़ बनती है रेखा , रेखा बनाती है आकृतियाँ , और फिर पूर्ण होते प्रयोजन । सतत एकात्म का खेल चलता है , मूर्त - अमूर्त का एकात्म ।

कितनी सुंदर बात है की रेखाओं का जन्म भी रिक्तता से होता है । रिक्त जो पूर्णता का पर्याय , इसीलिए कभी कभी इन्हे रिक्त की रेखायें कहा जाता है जो अपनी पलकों में गहरी रात के काजल को सहेजकर ख़ुद ब ख़ुद सुर्ख सफ़ेद सतहों के बाहर झाँकती है । वैशाख की तपती दोपहर में पल - पल पके अमलतास के नन्हे निवेदनों को स्वीकार कर कितनी सहजता से उस ' रमते दृग ' के सामने फैला देती अपनी काली कमली ...कभी अनायास ही सुनहरे क्षितिज पर अधलेटी सुनती है गर्म हवाओं का यमनराग तो कभी पीपल के सूखे पत्तों को त्रिताल की संगत देती है । व्यक्त , अनभिव्यक्त के ताने - बानों के बीच खुलने बंधने का क्रम निरंतर जारी रहता है ,कोई उत्सवी परायण आते - आते अपनी ही देह में अंतरध्यान हो ,सुरमई लफ्जों की हामी भर तैलंगी औघड़ के जंतर की मैली डोरी हो जाती है ।

रिक्त की रेखायें करवट - करवट मौन के संतुलन के सहारे अचरज की अटकलों में डूबे पहाड़ पर कौंधती बिजलियों सी आ धमकती है ...बिन बोले ही काँच की बिसतों पर अक्षरों की बुनाई से छूटे अजनबी रेशों के संग अपनी ही सुधि जगा चमकदार फलसफों के पुलिंदों के बीच बहते पानी की उंगलियाँ थामे बूढी यात्राओं के रूखे पगों को नम करती है
। ठीक वैसे ही जैसे कोई स्वत्रन्त्र एकांत टूटी समाधी के पार राग आसावरी के संग विश्वसनीय लगता है / वैसे ही जैसे कोई सुनने सुनाने लगता ईश्वर की बात /वैसे ही जैसे शब्द रोशनाई में नहाकर सौ -सौ फल फलता /वैसे ही जैसे आँखों के सामने बाहर निकल , समुद्रविसर्जित मात्रायें संवाद के अर्थों के साथ अधिक मुखर हो जाती है ,मनमय आभासों के सहारे सब पार प्रकट हो अपने भूले हुए गंतव्य को अर्ध्य देती है ।

रिक्त की रेखायें अपने पंखों को बादलों की ओट में पसार ,मल - मल कर नागकेसर , किसी अन्य उडान को निकल जाती है ...धीरे से ।