बुधवार, 18 नवंबर 2009

निसर्ग ही मेरे लिए...

वह 
देखती है 
चाँद को 
चाँद 
कहीं अधिक 
रौशन हो जाता 
रिक्त में रंग सजाता है 
सफ़ेद अब 
सफ़ेद नहीं रह पाता 
उसकी उफ़ से 
दामन में स्याह भर
आकाश को 
गहराता है 
अनायास 
वह कहने लगती है    
निसर्ग ही मेरे लिए अब 
स्वर्ग है 

दाता बंदी छोड़ -2

दीखती
बंदगी है
बंदी नहीं दीखते
वे तो
पहुँच चुके
अपने मुकाम तक
थामकर हाथ
सिरजनहारे का    

दाता बंदी छोड़ -1

सूर्य कुण्ड पर
पहरा देते
गालव महाराज
पूछते हैं परिचय
हर रात
मिहिर भोज की
प्रतीक्षा में
वह सुगंध
तेली मंदिर के
चक्कर लगाती है
शिखर का आमलक
आकाश उल्कायें थामता
ठहरा देता
गोपाचल
घन मेघों को
अब तक जो
बंधे थे
पहुच से बहुत दूर
छू लेते  हैं आज
बावन कलियों के छोर
इक निरंकार निर्गुणी
नाम ले  
दाता बंदी छोड़

सोमवार, 16 नवंबर 2009

निर्झर अक्षर

निर्झर
अक्षर
अनजानी
देह भिगो देते हैं ,
रोम - रोम फूटते
किन्ही
बिरवों से
बन - बनकर
दाता के
सबद निरंतर

सोमवार, 12 अक्तूबर 2009

जानते थे गौतम..

हवा है
वह
छू ही
लेती है
भला कौन सा
घर
अछूता
कहाँ से लायेगा
एक लौटा पानी
जानते थे गौतम...
मृत्यु की उस  
शाश्वत
बयार को 

अकाम अवस्था में

चुपके से
खबर लेता
शुभ लक्षणों को देख
अपनी ही
आँखों का स्पर्श करता है
क्या
आसान होगा
अनंत काल तक
अजनबी धुरी के
सहारे चलना
सीधे-सीधे देखना
कहीं कुछ भी
अनैतिक नहीं
शब्दों के धोकों के साथ
पकडे जाने का डर
आखिर
विधियों के सहारे
कैसे जिया जा सकता
और  
कैसे पाया जा सकता
उस अकाम अवस्था में

महानिर्वाण

रविवार, 11 अक्तूबर 2009

अदृश्य जल जानना चाहता

पूर्वजन्म की
स्मृतियाँ
लहर दर लहर
दस्तक
देतीं हैं
अदृश्य जल
जानना चाहता
उन का
मुकाम
यथासंभव  
मेघ बनकर
बरसने की
भिगोने की
आकांक्षा है
उसकी 

टूटा पंख

टूटा
पंख
आप ही
उतर आया  
तुम्हारी
आँखों पर
खिले कमल की
पाँखुरी
समझकर

ए़क ही लय में

ए़क ही
लय में
बटोर-बटोरकर  
अवाक्
उस सूने आँगन में
किसी बहेलिये सा
फैला देता हूँ
वही पुराना
जाल
हाँ
कितना
सुहाता है
बिखरे खिलोनों में
अपना बचपन
खोजना






समय सहने का

समय
सोता नहीं
सुला देता है
गंगा में
बहाकर राख़
निकल जाता
बहुत दूर
फूंक से ढहाकर
देवताओं के
किलों को
समय  
सहने का
कहकर
चला जाता है

पहुँचना कहाँ

देखना
नियति है
आँखों की
लेकिन
पहचानने का
क्या
मसलन
चलना
नियति
पावों की
पहुँचना
कहाँ

शनिवार, 10 अक्तूबर 2009

झर जाने से पहले

लौटना है
उसे
अपने  घर
बहते समय के
लौट जाने से
पहले

चखनी
बारिश जो है
बादलों के
झर जाने से
पहले

सुनना है  
वह देस राग
स्वरों के
मौन!
हो जाने से
पहले

क्या संभव ?
प्रत्यभिज्ञान की
परिभाषित
संगती
कहीं कुछ
होने जाने से
पहले

शुक्रवार, 9 अक्तूबर 2009

लिखना सिखलाते हैं

डूबो-डूबो कर
खाली पन्नों को
काली स्याही में
सपने
कुछ
लिखना
सिखलाते हैं
भाग-भाग कर
कितना थका था  
खिसकती रेत में
धसक गए
पग मेरे
सपने
खडा करते हैं
थमा देते
महानिद्रा में
चमकीले
अक्षर बिम्ब 

एक मृत्यु ईश्वर

एक
       पत्ती
वृक्ष

एक
       बूंद
सागर

एक
      चिनगारी
आग

एक
      सितारा
रात

एक
      आकाश
अनंत

एक
      शब्द
मौन!

एक
      मृत्यु  
ईश्वर

समय रहते

नीली
गहराई में
पानी
फूल सा खिलता है
पर्वतों के मोड़
सुन लेते
उसकी आवाज़
कभी-कभी
जगा देते
प्यासे को
समय रहते

पृथ्वी

बादलों के
बीच से वह
पृथ्वी को देखता है
पृथ्वी
कितने ही सूर्य
वापस लौटाती
कह देती है  
यहाँ
हर पर्वत में
इक
सूर्य रहता है

गुरुवार, 8 अक्तूबर 2009

मेरी ही सुगंध बन


तत्त्वत:
अर्थ लिए
असमाधेय
मूरत
ए़क-ए़क
शब्द
सार्थक करती है
सच कहूँ तो
रोक लेती
मुझे
मेरी ही सुगंध बन
किसी तितली सी
नयी पाँखों पर
जा-जा कर
तार-तार
उस असंभव
उडान के
रंग गिनती है

कोल्हू का बैल

चूक
जाता
हमशक्ल
उफ़
सूंघता
युग युग
पहाड़ी के भार तले
कोल्हू का बैल  
सिर्फ
चकरी लगाता है
जानी पहचानी
आवाजाही में
तेज़ होता
वह शोर
क्या
कोई अंतर
उन फूस के
पुतलों में
मान बैठा है
जिसे वह
उपादेय रूप
ईश्वर का

कोकाबेली के फ़ूल 2

चाँद की
पैनी नोंक
तांकते
उभरते हैं
अपनी कायाओं से
थककर
फिर
इक बार  
खिलने को
कोकाबेली के फ़ूल

अपनी ही लय में


जोड़ती
संगत लहर सी
अपनी ही लय में
निर्भय हो
धकेल देती
खड़ी दीवार को

मालूम पड़ता क्या कभी
हर रोज
पा - पाकर
अपने  पग
नीचे उतरता है
वह चाँद

कभी पीर
कभी बैरागी
कभी आहें भर
दौड़ जाता
बचपन में
दीखता
पेड़ की तरह
उपस्थित
सचमुच
हाथों में लिए रंग
खडा रहता है
हर तट

तीर
पादुकाएँ
नीले घोडों की बागडोर
और
हरसिंगार की
प्रतीक्षा में

बुधवार, 7 अक्तूबर 2009

अदल-बदल कर अपनी बातें

गंध में
छिपा आवेग
आधे-अधूरों संग
रमण कर
चुपके-चुपके
परभाग
साबित होता है

भीतर - बाहर
शायद ही कोई
उस अदृश्य परिधि में
झांकना स्वीकार करता
परस्पर
अपने अपने
देव को बहला  
अदल-बदल कर
अपनी बातें
कह- कहकर
किस्से-कहानी
असल विरासत के
अंदाजे लगा
चिपक जाता है
महामंत्र संग

अंतर्मन
आदिसर्ग
विकल्प का
गोपनीय सूत्र दे
कृतार्थ
समाधिस्थ फूलों को
पकता है

मंगलवार, 6 अक्तूबर 2009

ओंठ छुईमुई के

दाँत
चमकीले दाँत
चबा डालते हैं
ओंठ
छुईमुई के
देखा आज
खुद
आँखों ने जिसे
बड़े पैमाने पर
बूंद - बूंद 
झरते

जैसे तैसे

रेंगता
समय
जान गया
फूंक फूंककर ही
सही
जैसे तैसे  
कह दिया उसने
पहरेदारों को

क्या कहा ?

वृक्ष ने
सँजोकर
रखी ए़क
सुन्दर कहानी
वृक्ष ने
बांधी है
उसको ए़क
पतली डोर

स्वीकारा है
जिसने
उसे
प्रार्थना सा
डूबो लेता है
आज वही
उसे
लहर लहर

कोकाबेली के फ़ूल 1


रात भर जागे
पानी के पंख
अपनी ही
शर्तों पर
डूब डूब कर
आहिस्ते से
सूरज को
कोकाबेली के फ़ूल
विरासत में सौंप देते हैं

हल से खींची रेखा
आकाश की बिंदिया
और  
पर्वत की जड़
अपनी ही चादर
उलट पुलट कर
जैसे तैसे
आडी तिरछी
ध्वजाओं से
गाढे रंग के आगमन का
मार्ग सजाती है

कोई ऋषि
धुआँ भरे
कमंडल से
उनके खिलने के
दस्तखतों को
बहाकर
शब्द की
हवा देता है

मंगलवार, 29 सितंबर 2009

अनुभव स्मृति मौन !

शब्द
अनुमान लगाते हैं
अपनी ही
दृष्टी में
खोज लेते
अनुभव
स्मृति
मौन !
क्या
उतरा जा सकता  
आवेग की
गहराइयों में
बदला जा सकता
वह
अदृश्य सम्बन्ध

संयोग से
समय-समय पर
उन रचनाओं से
गुज़र
अनेक स्थितियों में
विकल्प
साबित होते हैं
वैसे ही जैसे
उचित अर्थ लिए
ध्वनि का
कृतज्ञ होता है
आकाश

शनिवार, 26 सितंबर 2009

काला कौवा

काला कौवा
सूरज का
टुकडा पकडे
नई देह धरता
इतिहास की
सवारी कर
स्वांस स्वांस
स्वर्ण द्वीपों पर बैठे
पुरखों की अंजुलिओं को
गुडधानी से भरता है

काला कौवा
खोज लेता
हज़ार हाथियों पर
सवार अपने
आकाश को
गढ़ता
नक्षत्रीय गलियारे
बहुधा छानता
मीठी धूप
उड़ा देता
चौबाई हवाएं

काला कौवा
जाडों को बुनता
आँखों में जन्मे
जलावर्त को
पोखर में छोड़
बन जाता 
स्वयं उसका
परिकर
काला कौवा
तपते सूरज को
डूबों डूबों कर
ठण्डा करता है

कितना फासला

कितना
फासला
हमारे और देवताओं के
बीच
पलक भर का
या फिर
उससे अधिक
राजधानी की सड़कों सा
कितना 

आजीवन मौन में


कहते हैं
सूरज के साथ साथ
इक बहुत बड़ा
संसार डूब जाता है
जहाँ
पूर्वी हवाएँ
वृताकार रेखाएँ
और
सरकंडों पर पसरी धूप
मल्लाह के अंगोछे से
लिपट जाती है
श्रुतानुश्रुत कर देती
धाराओं को
बर्फ सी सफ़ेद आँखे
उखाड़ फैंकती है
खलुच का रेखागणित
पुकारता
देता जो आवाज़
सिरजनहारे  को
यथा ही नहीं
असंख्य लोक
परत दर परत
भानुमती का पिटारा खोलते
बटोरते कभी
स्वर्ण पंख
तो कभी
दौड़ जाते
आमूर्तित अश्व से
उसी मुग्धा में
वशिभूत हो
खिचे आते बारम्बार
पिया कभी था जिसने
अक्षयता का
घूंट
समासीन 
आज
वह
आजीवन
मौन में

उहापोह

जगह-जगह
उहापोह
करते करते
कदाचित
धंस जाता
असंभव व्यापार
कांट छाँट कर
स्वप्न दुरुस्त करता है
काफी हद तक
दुनिया आज भी
वैसी ही है

दूर की बात नहीं

हर तीसरे प्रहर आता है
अपने डेरे पर
बीज आगमन के समाचार सुनकर
जलाशय में फैंक देता
चाबियाँ
क्या कभी
कृपा दिखलाई
ईंट और पत्थर का
अनुमान ही लगते रहो तुम
निकल गया वह तो
फिर से
अपनी
तीर्थयात्राओं पर  

झिलमिल फुलझडी


झिलमिल
फुलझडी
हस्तक्षेप करती है
अपनी ही
प्रतिछवि का
गुणकीर्तन कर
निंदिया के
स्याह लहज़े को
पहचानती
कितना
बे- अक्ल साबित होता
कामधेनु को पकड़ना
दौड़ादौडी में अक्सर
चरचरा जाती
बनावट
कितने ही
रूपाकारों के साथ
शहतूत की वर्णमाला
मुलायम
संख्याओं की बनावट में
अपने रूपक अक्स के
सहयात्री खोजती है
झिलमिल
फुलझडी   
हस्तक्षेप करती है

रेत वह समुद्र ही

गर्म हवाओं से
पिघल कर
रेगिस्तान
सूखी नदिओं में
बहने लगता है
बढ़ना चाहता
हिमालय की तरफ
अपनी आँखों को  
बर्फ से
ठण्डा जो करना है
उसे 
बर्फ
हो जाना है 
लेकिन
अमलतास के फूल तो
समुद्र को पाना चाहते हैं
रेत
वह
समुद्र ही तो है

अव्यय रुद्र: का स्तवन


इतनी दक्षता
स्वयं संपृक्त करता है
किसी लय पर
कहीं न कहीं
उस परोक्ष का अवगान
वृथा नहीं होती
वरेण्य पितरों की उपासना
स्वर्जित अनुभूतियों के सहारे
भस्मवत लोक दर्शन
आखिर
कितनी लम्बी है डोर
निरंतर आने जाने की कहानी
प्रतिकृतियों के पार
फैले कोहरे को मथ
फिर नये
नेत्रों को खोजने की लालसा
कहाँ केन्द्रित वह
धूप-छाँव
उत्पन करने वाला
महाभूत
अनुरक्तित ओज़
कहाँ वह
प्रक्षालित  
स्वयं संवेध

शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

ले उडी

कहकर 
कुछ शब्द
कमल की पंखुरिओं से
झरते
समय को
कथा सी
ले उडी


नहीं
संभलता
उससे
समय
अब तो सिर्फ
निशाना लगाती है
चिडिया
शाख दर शाख 
हरा जोबन चढाती है

शब्द या अर्थ

शब्द
या
अर्थ
युगानुयुग
दीखती
आकाशगंगा
नया कुल
नया गोत्र
पृथ्वी के दूसरी ओर
अंतस के अनंत गर्भ में
बंद आँखों से
देवशिल्पी
विजया के अक्षरों को   
स्वयम्भू की
सिद्ध विद्यायें बनाता है

पूर्ण होने दो


पूर्ण
होने दो
रिक्तता
दिगंत्व्यापी विस्तार में
नये दृश्य बनने दो

निराधार है लड़ना
अग्निशिखाओं से
जटाओं से
रिस-रिसकर जो
मशनों की भस्म
बन जाती
आप ही
खींचती
अपना स्वामी
मरुथल में

खामोशी से धर दबोचती है

मुश्किल है
बहुत मुश्किल
झेलपाना
हज़ार सूर्यों को
वृथा ही
प्रायोजित लोक में
नहीं बुनी जाती
रिश्तों की चादर
जहाँ 
सूर्यास्त और
सूर्योदय के बीच
नहीं रुकने देते
वे
इक पल भी
अधिक
किसी
शब्द को
पूर्ण   
होने दो
रिक्तता

तथास्तु

अहिल्या सी
पल-पल
प्रतीक्षा करती,
बूंद-बूंद
स्पर्श
पहचान जाती है
गुफाएँ
छिपा लेती
अपना गर्भ
छिपा लेती हैं
"तथास्तु"
वरदान  

मुझे भी कुछ


मुझे भी
सिखला दो
उड़ना,
पंख लगा
धकेल दो

आज
होड़ लगी है
लगन लगी है,
हाथों में
दे दो कमंडल
गले में पहन
शिवलिंग
बजाता रहूँ बस
डमरू डम-डम
आपनी सी
आँखे दे दो,

बना दो
जंगम
सिखला  दो
मुझे भी
कोई
मंत्र

देखते देखते

देखते
देखते
बदल  जाते
नेत्र,
रेशम सा 
पतला
पड़ने लगता
जल,
देर-सवेर
गीली माटी
छाप लेती
पगतलियाँ,
चुपके से
ढक देती उन्हें
बरसती  रात में
यूँ हीं
देखते 
देखते

इक आचमन

पानी को भी
प्यास लगती है
होना चाहता
तरबतर
उसे भी रहती

प्रतीक्षा
आजीवन

बादल के
इक
आचमन की

गुरुवार, 24 सितंबर 2009

कुछ दाने मकई के


अब क्या
कहना  उससे
जो भूल चुका
अब तो
बैठा रहता है
इबादतखाने में
बुलाता
अपने खुदा को
बिखेर
कुछ दाने   
मकई के

खोजते रहो

सत्य
दीखता नहीं
सुनाई भी नहीं देता
लिखा जाता होगा
शायद
रहता होगा
सहस्त्रों निवेष्टों मध्य
बस यथाशक्ति
खोजते रहो
खोजते रहो उसे 
निक्षिप्त शब्दावलियों में
कहीं 

बीज सूरज के

बोये हैं
बीज
सूरज के
हर हथेली में 
उसने, 
अँधेरा
मिटाने के लिए   

खेल खेल में

तोता,
मैना,
मुनिया,
तितली,
और
हम,
सभी  
उड़ जाते
खेल खेल में
ए़क ए़क कर

नाम तो कागजों पर

चेहरे
याद रहते हैं
नाम अक्सर भूल जाता हूँ
नाम तो
कागजों पर
लेकिन चेहरे
कहाँ
खोजो तो ज़रा

जोगन का जोबन


चुरा
जोगन का जोबन
रंग डाला
सुनहरा रंग
खुद ने
ओढ़ी है
काली कमली
अब क्या कहूँ
उससे ,
आते ही
कमंडल में
हो जाता
जो 
गंगाजल

आकाश थामता

नीला जल
थामता
पर्वत को,
पर्वत
आकाश थामता,
बदलता है
कितने रूप वह
भीतर की
मंथर
कल्पनाओं को  
बहलाने के लिए .

सोमवार, 21 सितंबर 2009

कोई भेद बात नहीं

फिर
अभिमुख हो
अंग अंग
गुच्छा गुच्छा
शुभ होता है
कोई
भेद बात नहीं
देस देस
बादल बादल
कही अनकही
पूर्ण पाठ रटता है
कैसा कठोर
कोलाहल में
शीतलता मथता
कस्तूरी मृग सा
पर्वत पर्वत
जगमग
जोबन चखता
कहीं दूर
वह लीन तपस्वी
उत्सव अनबुझ रचता
समागमन संकेतों के
विलय अर्थ खोजता    

रह रह कर गुज़र जाता

रह - रह कर
गुज़र जाता
सहसा
वर सुंदरी के स्वप्न सा
सब कुछ
भीतर ही भीतर

आखिर किसे
निर्बन्ध करती
स्वर्णमणि की परछाईं
पहचानता कौन
उपासनाओं को
बारम्बार कहता बुनता
रंगबिरंगा ताना-बाना
किसकी खातिर
अहाते तक रख्खे जाते कदम
किसके लिए
दोहराये जाते मंदस्वर
किसके माथे मढा जाता
एकांतिक आलिंगन

नहीं पकड़ में आता
रह रह कर गुज़र जाता

मंगलवार, 15 सितंबर 2009

कोयले सा

कितनी आँखों से
देखा
अतीत
ठोस मायाजाल
कोई और है
समय सा
स्वछन्द
अर्थ सा
अहर्निश गतिशील
निरुद्देश्य ही नहीं
बहती नदी
तराशती शब्द
स्वेदकण सी
अवचेतन
भावशून्य
बनाता है निमित्त
महज़ एक है
जो लेता सन्यास
कोयले सा

महानिद्रा की प्यास

उसी आभा के
इर्दगिर्द
कभी पानी,
कभी कागज़,
कभी आलाम्बित,
कभी आश्वस्थ,
कभी अधर में तैरता
तो
कभी देवताओं के स्वप्न खेवता है,
किसी आज़माये नुस्खें सा
यहाँ वहाँ का उजाला
बटोर लेता,
परमपुरुष पुष्पदंत
कुछ खास अर्थों के साथ
तिनका तिनका
शून्यता का व्यूह बिलोह
विमोहित सृष्टि के
आदिम रिवाजों पर
नसीहत फरमाते हैं
हथेली भर धूप ले  
महानिद्रा की
प्यास
बुझाते हैं

सूर्यकांतमणि का इंतजार


रह-रह  कर
गुजर जाता
पकड़ में नहीं आता
सहसा
वर-सुन्दरी के
स्वप्न सा
भीतर ही भीतर,
यादों की तमाम तसीरें
उस एकांतिक
आलिंगन के साथ
दिशाओं के अहातों तक
रख देती कदम,
रंगबिरंगे ताने-बाने से
जुटाती 
लिपिबद्ध
मन्द स्वरों के
अर्थ,
अपने
आवरण के साथ
साँस दर साँस 
टुकड़े टुकड़े हो
पल-पल
कैसे निभता
सूर्यकांतमणि का
इंतजार

नामकरण सी डुबकियाँ

छिपाती
अपना दुःख
टटोल टटोल कर
हथेलियाँ
आप चौकन्नी,
कैसे कोई
विरोध करेगा,
औदुम्बर वृक्ष का
अकारण ही कसौटी कसेगा,
झूटे लगते उलटते दांव
मोह के आक्षेप जैसे
क्या
कभी उल्लेख होता है
प्रतिज्ञा में बंधे
एक एक दिवस का
पम्पासरोवर पर पहरा देती
उन परछाइयों का,
अविकारी नियंता की
दृष्टी की आस में
नामकरण सी डुबकियाँ
लगालगाकर 
बारम्बार
खोजती जो
मूल देह अपनी  

पूरब दिशा का सेनानी

हज़ार अनुभव
सदैव
भीतर ही भीतर
किसका अधिकार
स्मृतिरूपी भीगी देह पर
ऐसा फैनिल
मानो ज्वार ,
निग्रही आँखे
अचानक गलने लगती हैं
निरुत्तर
रह जाता
सरोवर भी,
कितने ही
कन्धों से गुजरता
पराजय का परिचय
ठहर जाता
महाद्वार पर

इक-इक पल बाद
इक-आध
वचन कहता
डबडबाये नेत्रों के
साये में
अपनी उंगलिओं से
महसूस करता
रेत में छिपी
चिनगारियाँ,
कैसे
कुल देवताओं से
क्षेत्रवनवास का
शुभाशीर्वाद चाहता
कैसे
पहली बार
किसी आँचल में
पनहा लेता
हिचकोले देने वाला
पूरब दिशा का
सेनानी

अनागत काल से

अनागत
काल से
किसी आलवक यक्ष सा
परिज्ञात होता है,
संचारी
अन्धायी बदरिया जैसा
कहते हैं
यह पर्वत
निगल जाता,
निरंध
कौतूहल मचा
भींच लेता
असल सत्य

कोरित कर
अपना अहंकार
पूर्वागमन से पूर्व ही
नवीन इषुधी
पाना चाहता,
अपनी
वृति से भिन्न
छूकर एकाकी मौन
स्मरण कर
कुम्भ के जन्म की कथा
ठिठुरती साँझ के
ठौर ठिकाने की बात करता है
अनागत काल से

सोमवार, 14 सितंबर 2009

क्यों

पैने-पैने
शब्दों की
वसर्जित मात्राएँ
क्यों
अचानक ही
संवाद के
अर्थ संग
अधिक मुखर  
हो जाती है

तीर्थ हो जाने का विधान


कहते हैं
माया के भीतर कि माया
नीलोत्पल कि पंखुरी में
रहती है
धाता विधाता सी
परिधियों के पार
तर्क से अतीत
अकर्म कि गाथा से हामी भर
सम्भोधित सत्य के सहारे
अनादि सिद्ध विस्तीर्ण
वामदेव के संग
अपना
भव
सजा कर
व्याख्यायित करती है
अपनी भाव भूमि,
पारियात्र पर्वत
जहाँ
युगानुयुग
संभावनाओं के सोपान
तराशते चुनौतियाँ,
पंक्तियों के विन्यास
खेलते
विरूपण लुकाछिपी
आखिर
व्यपक है उनका अपना
सुनहरा रुपहला आकाश
जीवन कि रीत
और
माया के भीतर कि माया का
तीर्थ हो जाने का विधान

अशेष स्मरण

अशेष का
स्मरण  कर
भस्मीभूत
आवाहक सूर्य,    
निरुद्देश्य रोके गए
मूर्तिमान मेघों को
मुक्त करता है,
स्वीकार्य सीमा तक
अतलतल हलचल का
अतुल्य भागीदार बन,
स्वछंद संपादित
सन्यास का संकल्प ले
आराधना में डूबी
निर्झरा को
भैरव मंत्र
देता है

अनुगम कर
सिद्धहस्त रूपाकारों का
अपराजित धाराओं कि विशाल
भुजाएँ पकड़
अंतहीन
सुखकारक
यथार्थ को
बारम्बार बुलाता है

बीती रात से पहले

नहीं
जानता था
बीती रात से पहले
कि
गाँठ
किसे कहते हैं
शायद
जीवन लगेगा  
खोलने में
जिसे अब

दुःख , विछोह का

सुनहरी
सतह पर लिखे
काले काले अक्षर
यकीनन
सौभाग्य  परोसते हैं
अपनी सलवटों को समेटकर
कितनी
सहजता से भुला देते वे    
दुःख ,
विछोह का

मनहट कौन साधता,


आखिर
किस पर है
भरोसा,
अधरस्ते में छूट जाते
कुछ नये,
कुछ पुराने,
कुछ ओस में नहाये,
कुछ प्रार्थनाओं,
कुछ प्रतिघातों में,
कुछ पास,
कुछ दूर,
कुछ दुबके दुबके
अंतर्मन में,

कहाँ है
अजरावर अनजानी काया,
अखंड लय विन्यास ,
सूर्यरथ ,
रंगमहल के राजा
कौन
रहता राखता
किसके शब्द
कहे सुने जाते
कौन
खीच लाता उस दृग तक
कौन
कागज़ के दीप जलाता
मनहट कौन साधता,
आवारा बादल
या
अथाह आलिंगन

आखिर
किस पर है
भरोसा

बारूद का इत्र छिडक

बूढा समय
सफ़ेद रंग पर
आ गिरता
लम्बे-लम्बे दरख्तों कि
खबर ले
पतले डंडे से
मछली
फूल
मशाल
बनाता है

वहीँ
कुछ हाथ 
बहुत दूर से
मौत से आधिक धुंधला
मकड़जाल बुनते  
बारूद का इत्र छिडक
बुलबुल पर  
छीन लेते हैं 
उसका बसेरा

कोई खलील

कोई
खलील
अराक के
जंगलों में
पश्मीना ओढे
सत्यासत्य से
जूझते
इब्राहिम के
आगमन कि प्रतीक्षा करता है   

बैजनी छठा

बिखर जाती है
सजीली फुलवारी पर
पलटकर
अंजान
बारूद के गंध सी

एक एक को वर


मन ही मन
सतरंगी सपने
एक एक को वर,
बूढी परछाई
मखमली कहानी सुनाती है,
पंख वाला मनुष्य जहाँ
खोज लेता  
अपना मुकाम,
देखा...
कैसा अवसर के अनुकूल
वह अश्वारोही
दशरथ पर्वत से उठती
हवाएँ निगलता है,
वस्तुतः
इतना आसान
नहीं होता
दूरस्थ नक्षत्र
प्रभावित करना
सतरंगी सपनों को
दिग्विजय का
वर देना
मन ही मन

कौडियों सा पलटता

कौडियों सा पलटता
चाहे न चाहे
असंगता
क्या मालूम होता
काल गणित
निकलकर भागते
पहुचते प्रतिष्ठाओं के पार

चहचहाती चिडिया
 सीख  ही लेती
रहस्यमयी विद्या,
पीले रंग में नहाती
शिशिर ऋतु
कल्पनाओं के आंकलन में
भव बाधा लांघना चाहती,
दमकता पहाड़
आप ही जान लेता
देता संकेत
उपमाओं के 

क्या
कहीं समीप
रह पाती अवस्थाएँ
सुनिश्चित है जहाँ
गुलदाउदी का वनवास
अधूरा अधूरा रहने कि चाह

हाँ
अभी समय है
वृतियों के खंड-खंड होने में
हाँ 
अभी समय है
सुरजमुखी को
महासिद्ध होने में  

सफ़ेद सपना

देखा
इक
सपना,
अलसाया
गहराया,
दोहराया  सा
सच सोचा,
सयाना
सफ़ेद
सपना   

शब्द सुगंध में...

आते आते
कहीं  गुम
कुछ
अनभिव्यक्त रह जाता है,
आँखे,
चकोर बन
पीना चाहती
आपनी ही बिछाई रे़त पर
लहर सी पसर
शब्द सुगंध में...
करती 
अहंकार !
विसर्जन

चिरंतन श्यामल

चिरंतन
श्यामल
इतनी आकर्षक
कल्पनाओं से अधिक शक्तिशाली
ह्मूनसांग कि आस्था सी

क्या
यही होती
अविद्या पर विजय,
पारदर्शी पर्वतीय श्रंखलाएं
इक ब इक
सवालिया निशान गढ़ती हैं,
खड़े- खड़े खोल
अपनी गठरी
समतल अग्नि को
धधकाती

प्रवाहमान तरुणाई भी
अनगिनत पुष्पों में
डुबकियाँ लगा
एहतियातन
उस 
समरूप
कलंदर के
कलेवर
देखती है
चिरंतन 
श्यामल

रविवार, 13 सितंबर 2009

स्वप्न कि अंतेष्टि

खोजना है
मुझे
अब
सुख
स्वप्न 
कि
अंतेष्टि में

भागती रात को

किसे
बांधना आता
भागती रात को
सिवाय
आलोकिक
नेत्रों के तुम्हारे !
कालिन्दी भी
अधबीच ठहर जाती  
संगृहीत करती
तुम्हारी आँखों से
रिसता
काजल

पानी में पानी

पानी पर तैरती
डोंगी को
छूता बुलबुला
दे जाता
गोपनीय ज्ञान
लहरों कि मौजों का
पानी में
पानी हो जाने का

कभी कम कभी ज्यादा

कितनी
लम्बी होती जाती
तिरते स्वप्नों कि
छायाँ
अकारण ही नहीं
ख़बरदार करता है,
आसमान का टुकडा
तितली सा
अर्थ बदल,
गर्भ के अहाते तक
देख सकता
आकार
 भव का
कभी कम
कभी ज्यादा

दो फाँक

दो फाँक
नज़र आती
चट्टान,
भुरभुरा जाता
ख़्वाब गडरिये का,
पानी
लहर लहर चढ़ता है,
लौटती हवा सिद्ध करती
अपनी अहमियत

कई कई जन्मों तक
गहरी राख़ जैसी
आप बनती
आप ही बिखरती है
नशीले रंगों में
रची बुनी
दिशाएं,
तमाम दावेदारी के
बावजूद
उन्ही पुतलिओं के
इर्दगिर्द
अपना
भुवन तलाशती है
जहाँ
दो फाँक
नज़र आती 
चट्टान

कौन गंगाजली उठाये

कौन सुनेगा
अश्वगंधा और रक्तचंदन
कि कथा
कौन देखेगा
तिस्ता के तिलिस्म को
कौन करेगा
नागलोक के
अंतस्थल कि यात्रा
कौन सीखेगा
चंद्रमा से कलाएं
कौन जानेगा
पुरातन का कारुण्य
आखिर
कौन गंगाजली
उठाये
भार भरे लोक कि सुल्तानी छोड़
दण्डीस्वामी का संग करेगा  
या फिर
वर्णित वाक्यों को
अनसुना कर
केवट सा
प्रतीतिक बेडा
पार लगाएगा
कौन

दूसरे जैसे होने कि भाषा में

दूसरे जैसे होने कि भाषा में 
तीसरी अवस्था 
सचेतन 
उदभासित व्याकुलता 
धीमे धीमे कृत कृत वचन 
बह बहकर 
बचपन में लौट जाते 
घिस घिसकर 
नामचीन चाकू 
संजीदगी से केवडे कि खुशबू चुराते हैं 


रिमझिम 
स्वर्णवर्षा भिगो देती 
नरसिंह कवच 
सरगमी परायण बाँच
आधभवानी, पंचानन 
करते वनगमन 
संभवत:
सबकुछ प्रतीकात्मक नहीं होता 
नापतौल के दिया जाता गंगाजल 
उच्चतम शिखर
लम्बी यात्राओं के 
पग पकड़ लेता 


और 
तुम्हारा यथार्थ 


चौकस मालिक होने का हुँकारा देता है 
दूसरे जैसे होने कि भाषा में. 





अपने ही साहिब में पाता है

खोजता
पीड पुराणी
माथापच्ची कर
वैकुंट कि यात्रा कर आते हैं
सिलखडी पर कोर देते
मंत्रयोग
पंच से पंच का तात्पर्य

सिद्धांतों के संदेहों से पार
बांटकर सुनहरे बीज
दत्तचित्त  हो
अंग और अंगी का
भेद बताते हैं,
कौन बडभागी
ब्रह्मज्ञान कि बात करता
गुदगुदाता
ज्वारभाटों को
विरह के बाणों को
नयनों में समा लेता,

आकाश पर मेघ ,
पृथ्वी पर जल ,
रहंट पर
कौतूहल
बिखेर देता,
अखंड ध्यान
लयलीन
अपने ही
साहिब में
पाता है

खोजता
पीड पुराणी

नैनों का क्या

 
नैनों का क्या
हरसू
अस्वीकृत करते
खो देते
अपनी सुधबुध,
कहीं कोई बिरला
करता दीदार,
बजाता 
हजूरी
रहमान कि

भव के
ताने-बाने से परे
सहती है
ज्वार पर ज्वार,
बहुत कुछ छिपाती है
छुई मुई

धडाधड
भांति- भांति के स्वर
कूच करते हैं,
खाली तुणीर भी
भाँप लेते
करतली

जायफल कि
मादकता में
डूबे
यमलोक के
पहरेदार
ठहरा कर
यौवन कि धूप घडी,
चुपके से
चुरा
लेते हैं
रचाबसा
पानी का दुर्ग

नैनों का क्या
हरसू
अस्वीकृत करते 

करतब करतार के

नैरन्तर्य
स्वीकारा गया सत्य,
चुपचाप ही पकड़ता है
बुन देता
रिश्तों के ताने- बाने में,  
अक्सर
परखा भी जाता,
कहता 
रहने दो उस रहस्य को
जहाँ दुबकी
जन्मजात अबोधता,
भीतर मन की चुप्पी
और एक स्वप्न के
साबुत रहने की चाह,
किसी शब्द संवाद सा
मुँह माँगा वरदान

न जाने कब से बहता
ये तीरथ का पानी,
न जाने कब से चलता
ये आवागमन का खेला,
न जाने कहाँ
प्रतिकृत होता है
अपनी चेतना के
सहारे
फिर देखता
करतब,
करतार के
नैरन्तर्य

शनिवार, 12 सितंबर 2009

धसते पगों के साथ

कौन करेगा
जबीसाई
कब कहेगा
मेघ शब्द
यशोगान

इत्मीनान से
तेज़ करनी है
लौ
मशालों की
आप परिचित दृश्यों के साथ
समा जाना है
रे़त के समुद्र में

बहुश
बेमानी लगता
अपने अस्तित्व से अलग होना
मंडराती खामोशी में
धसते पगों  के साथ
लम्बी-लम्बी ढलानों से
गुजरना

स्निग्ध चांदनी भी
जहाँ

चूभती है
नुकीले तीरों सी
इत्मीनान से

पारस की चिनगारी

पानी
पायल
प्यास
प्रतिष्ठा
देखी है
भर्तहरी ने
ठोस समाधि
पारस की
चिनगारी
देखी है 

उर्ध्वगमन

यकीनन
उर्ध्वगमन,
जन्मों-जन्मों से
निराहार
दिगंबर सा
इनकार नहीं करता

नरगिसी आभा में
कचनारों के पार
बारीक़ हुनर उन
कौंधती बिजलिओं से
चिंगारियाँ चुरा
अवसादों को स्वाहा करता है

वहीं
कठोर कवच में लेटा
बूढा कारतूस
सहज सिंगार कर
चिर स्थायी अम्बुज का
अन्तराल नापता
यकीनन
जन्मों-जन्मों से
वैसा ही
उर्ध्वगमन

चुपचाप ही

चुपचाप
संभाल लो
अपने अपने 
जंतर
धीमे स्वर में
बदल लेता बनावट

जादुई दस्तखत
ख़बरदार करता
उत्तरार्ध में बसे
सागवान के संग- संग
ठीक- ठीक जाना जाता

अपनी
सुगति के सहारे
शब्द का शब्द
दिवस का दिवस
रात की रात
मथता
जतन कर
सिंहासन पर काबिज
सूर्यसुता के जल से
काजल चुराता है

कितनी
सटीक लगती
पराजय की पुष्टि
कमाल की पंखुडियों से
चिपके अग्निरसायन सा
वशीभूत ,
क्या कहीं कोई
अवसर ,
बलभद्र ,
द्वारिका

सच पूछो तो
बिखरा स्पर्श
जयजयकार सा
कृतकार्य साबित होता है
कहीं
चुपचाप ही

चित्ररथा के स्वप्न सा

परस्पर
प्रकृतिस्थ,
कभी
गहरे नीले रंग का
कल्पनालोक,
कभी
सूर्ख़ पीत तंत्र,
चित्ररथा के स्वप्न सा
सम्पूर्ण संभावित
एकाधिकार,
अपने ही
गर्भ को भेदकर
निर्मायक 
उल्काओं सा प्रभामय
सुलोचनिय पिंड,
धवल रेखाओं में
काले त्रिबुज पर टिका
महावल के रंग में रंगा
दो चहरों वाला
जिस्म
खोजता है,
परस्पर

साँची का सुनहरा सूरज

उत्सवी आवरणों से दूर
स्तूपों के सायों में
अपनी ही
शाखों के कन्धों पर
कश्तियाँ लादे
ब्रह्माण्ड के रहस्यों में
गोता लगाता है

अपने
घेरे को तोड़कर
निगलता है
कई मंज़र
कहीं अधिक
गहरा
बिंदु- बिंदु
बनाता है
बिम्ब
वेदिका पर टिका 
ये
साँची का
सुनहरा  सूरज

मौन ...!

जानना
चाहता हूँ
इक शब्द
मौन ...!
कविता , अमित कल्ला , मौन...!

दिग्विजय की बातें

सिर्फ
प्रार्थनाओं के सहारे
शब्द से शब्द
रेखा से रेखा
नेत्र से नेत्र

पाबन्दियाँ
तरफदारी
अथवा
दिग्विजय की बातें
 समय
ताकता
सही सही का
अर्थ खोजता

दो टूक
कहाँ लिपट जाता
कौन पहचान पाता
चटक रंगों के कोलाहल में
उन सयाने
ख्वाबों की
यात्राओं को
सिर्फ
प्रार्थनाओं के सहारे

हार

स्वीकार ली
हार
मैने अब
कुछ अधिक
पाने के लिए

नहीं जानता

नहीं
जानता
कहाँ खोजाता
शायद
इक सपना ही

मन में
रह जाता
अबूझा सा सवाल
कभी- कभी
संभल-संभलकर
कुछ इस तरह कहता
अपनी बोली
अपना पानी
अपना लोक-परलोक

फिर क्या
अपने वक़्त के साथ
अपना रास्ता स्वीकार लेता
उलझा-उलझा आकार
पूरा का पूरा वृक्ष
या मुट्ठी भर अनाज,
अपने आप ही भर जाती
वो नन्ही सी धारा
हर आहट के साथ
मुक्त होता इक
पहाड़ी तोरण

क्या कहते
खीचता कोई
दामन ऋतुओं का
नहीं जानता
मैने तो सिर्फ
उगता हुआ
काला सूर्य देखा है

आकाश - पाताल के मध्य

उस आंशिक
सत्य के सहारे
करते
अज्ञात आवरणों का
विसर्जन,
अपनी ही ध्वनि में
अपने अंतर में
पूर्वकथा का स्मरण

आकाश - पाताल के मध्य
पर्यंक मुद्रा में
सौंदर्य से सजल
वह महावृक्ष
अधीर हो जाता है

समय समय पर
किसी उत्सव मूर्ति  के 
देशाटन सा
मनमाना वरदान देता

परिष्कृत वाक्य
जहाँ
निर्मल नीर सा
रुनझुन बावरा बन
आकारहीन
अंतर्मुख संयोग को
सौप देता,
महापथिक की
दृष्टी से उपजी

सिद्ध्मणि

आकाश - पाताल के मध्य
उस आंशिक
सत्य के सहारे

शुक्रवार, 11 सितंबर 2009

किसका सगा

अपनी ही
बिछाई चौसर पर
बहुपाश में कसता

देख सकता हूँ
सन्नाटा

आखिर

किसका
सगा है
अन्धकार

लगातार

लगातार
अपने साथ ले जाता
कैसा लचकीला
ज़ार - ज़ार

बहुधा दिखाई देता
ताईरे - अर्श सा
सच 
मोह लेता है
परिवास

जरणा जोगी बन
कागज़ के टुकड़े संग
 गहरे समंदर की
यात्राओं पर निकल जाता

देखता
टकटकी लगा
उसी ध्रुव तारे को
बनाया जिसे
अपना इश्वर

लगातार

ध्यान मग्न

कल
चले जायेंगे
धूनियों को छोड़

अस्थाई डेरे त्याग

प्रस्थान
गंतव्यों की ओर

शिप्रा
यथा ही बहेगी

जब तक
महाकाल रहेंगे

ध्यान मग्न

कैसी दुविधा

कैसी दुविधा
बुदबुदाता
छूना चाहता है
बेआवाज़ ही रख देता
हर रंग हर कहानी
कैसा
अकेला ही पाता
ऋत पर विजय
वैसे भी
किसे देखती
अन्दरुनी निगाहें
तह पर तह जमती जाती
सच
आग है निर्वसन
हाथ जोड़े , हिचकोले खाता
संगेमरमर पर
फिसलता है
यहाँ वहाँ के खेलों के बीच
कभी छू लेता
आकाशीय चेतस वर्षा 
अक्षीय बंध संग
कैसी दुविधा

पलक - पलक अगहरूप

 आखिर कौन
 लौटता  हैं वापस
उन धुरीओं के बीच , 
दिखाई पड़ता जहाँ
अंतर्मन का कौलाहल

निहितार्थ ही
अधूरा नहीं
छोड़ देता
जुलाहा ,
मृत्युजेता पवन के
आस्वादन का
ताना-बाना ,
हर इक शब्द में
उस
जागते अवधूत का
अविज्ञात
अध्याय हो जाता है

सामानांतर ही
ठहरा समय
विराट वृक्ष की ओट ले
मलई राग गाता ,
 अर्धचंद्र ,
बसंत में डूबी देहर को
पंक्ति - पंक्ति मायारस
चखा
अनासक्त हो
जुगजुगाते तारे संग आँखे खोले
पलक - पलक
अगहरूप सा
बेखोफ़ ,
सीधे कदम रखने की
ज़हमत उठाता है




 .

गुरुवार, 10 सितंबर 2009

हिये का बैरी

अजन्मे
स्वप्न को छूकर
निरंतर


लहर दर लहर
माटी के सिकोंरों में
बूढे सितारों संग
अकेला ही
तैरता

हिये का बैरी
वह...
चमचमाता पुखराज !
कैसा .

दीर्घकाल तक

आसूरी
आवरणों के बाहर

दीर्घकाल तक
कुछ नया

न जाने कैसे
विश्वसृष्टि का संवाद
अनझिप ज्योति की
निजता लिए
कल्पित रंगों के रसायन में
घुलमिल जाता

माप - माप कर
सहजवृत्त अमूर्तन की
अंतरदृष्टि
सविषयी तत्वों के
स्फुरण संग

शाकम्बरी का
चेतन स्पर्श हो जाता है

दीर्घकाल तक .

रविवार, 30 अगस्त 2009

क्या - क्या स्तगित

क्या- क्या
स्तगित करते हो
स्वप्न प्रक्रिया ,
अपने लोक की यात्रा
अथवा
अगले जन्म का इंतजार

बेतुका सा लगता
देता अगर
चुनौती
क्या समझना
क्या समझाना

थोडी - थोडी झलक भी
बहुत नाज़ुक लगती है
होते हुए भी नहीं

तत्क्षण
कितनी अबाध
जगाये जाने पर कहीं
ओर
निरंतर
अप्रभावित ।

समराथल

कितनी विस्तृत
ये रेत

अपनी देह के भार से भर जाती
पत्थर - पत्थर हो जाती
रेखाओं सी दौड़ने लगती है
कंकडों के किलों की
निगरानी कर
हज़ार - हज़ार स्पर्शों को चूम
अक्षांश - देशांतर जोड़ती

कहीं दूर
रात भी जगती है जहाँ
संभल संभलकर
सुनहरे त्रिकोण पर बैठ
फरागत से भरा
समराथल
बनाती

कितनी विस्तृत
ये रेत ।

निर्धारित निर्वासन

स्मृतियों की
खड़खड़ाहटों के पार
बूंद - बूंद
संवित विकल्प

कैसा वह
निर्धारित निर्वासन
स्वप्न से स्वप्न ,
काया से काया ,
भव से भव

एकाएक
मानों
किसी
टूटते तारे का पीछा करती
रेखा की पकड ।

बूढे पंखों का सहारा ले

बूढे पंखों का
सहारा ले
रंग
छिपे पहाडो तक
जा पहुचते

आप ही उत्त्पन
दिलासाओं के संग
सही - सही के
मायनों की दहलीजें
पार कर जाते हैं

हौले से ,
दौड़ते पानी की
रफ्तार माँप
काँच सी पोशाक
भिगो लेते

रंग
मांगे वाक्यों के
प्रतिबिम्बों में समाये
हाशियों को बिखेर ,
धकेलकर क्षितिज की दे

गहरे कोहरे को
मथने
कहीं और
निकल पड़ते ।

रमता दृग

दृग रमता है
रमता ही जाता है
पाता पर्वत
पानी पाताल का चखता
दृग रंग पकड़ता है
रेखाओं की संगत करता

दृग कबीर बन
अन्तरिक्ष के दिगांत विस्तार को
ताने-बाने में बुनता
दृग नानक सा फिरता है
हजारों हज़ार आँखों से देखता
हजारों हज़ार पगों से चलता है

दृग कोयल का काजल
तितली की बिंदिया
पंछी की परछाई
मखमल का जोबन चुराता

दृग शब्द पकड़ता है
इबारतों की इबादत कर
द्रश्य पार कर जाता
दृग रमता है
रमता ही जाता है

कितना भला होता रेगिस्तान

थाम लेती हैं उंगलियाँ
पानी की
रंगों से भरी
गाथाएं

रामभरोसे ही सही
कोरती उड़ते पंख
आसमान के,
बातचीत की बिसातों पर
अक्षरों की बुनाई से
छूटे अजनबी रेशे
मनमानी
सुधि जगाते हैं

आख़िर
कितना भला होता
रेगिस्तान
अपने बिछोने पर
यात्राओं के
रूखे पगों को
नम करता

गहरे - गहरे
साजों की संगत का
अर्ध्य देता है ।

आधे से आधा चुन लेता

आधे
से
आधा
चुन लेता

अपने आप
पानी सा
सब पर प्रकट होता है

चाक चढा समय
उस भूले दृश्य को
गंतव्य की
साझेदारी देता ,
पैने - पैने शब्दों की
विसर्जित मात्राओं
के साथ
अगली कडियाँ जोड़
फिर
दोहराता
तराशने वाला
तिलिस्मी हिसाब ,

अधिकांश
सिर्फ
आभास में
रख देते

कोई
आधे
से
आधा
चुन लेता

अल्लाह की जात - अल्लाह के रंग

इसक
की
कुछ आहट
जरुर लगती है

जिधर देखो
असंख्य दृश्य
अपने सा
अर्थ देते

पढ़पढ़कर
नन्हे निवेदन
केवडे के फूल
उस अपार नूर का
चुग्गा चुग जाते

अकह को कहकर
अगह को गहकर
कैसी कैसी
गनिमते गिनते हैं

दबादबाकर
गहरी रेत में
कितना पकाया जाता
भरी-भरी आँखों के सामने ही
बाहर निकल
पी जाते
अमर बूटी
मीठा महारस

तभी तो
हर इक
चेहरे को
ज्यों की त्यों
अल्लाह की जात
अल्लाह के रंग
का
पता देते हैं

इसक
की
कुछ आहट
जरुर लगती है ।

अधिक देखना हो

अधिक देखना हो
तो

बुरांश के फूल ,
महौषद कच्ची कच्ची इलायची ,
राजतामय
बदल वन देखे,

पहाडी पर लेटी
मावस की रात,
तोपों से चिपकी
अफीम की दोपहर ,
शब्द रहित गीला गीला सा
लीलामय लोक,
विलेखित स्वप्न
और अतृप्त
गर्वीला घुमाव देखे ,

अधिक देखना हो
तो
अंधे समुद्र का
जोगिया रंग देखे ।

यकायक

छलकता
नेत्रों की
गहराई से ,
रिझा रिझा कर
कराता
स्वीकार
हार

तोड़ता
कैसे
न जाने
अंहकार को

वह इक
यकायक ।

शुक्रवार, 28 अगस्त 2009

इस छोर से उस छोर तक

इस छोर से उस छोर तक
ए़क महापर्व,
स्वछ्न्दी चरित का
अवभृथ स्नान,
तरु से आधिक सहिष्ण
देह के स्पंदन

कभी - कभी
जहाँ
सोचना भी
होना हो जाता है
ठग लेता
अवनी को अम्बर

समुद्र भी
अपनी स्थिरता
नही रख पाता
लेता स्वांस
अकुलाहट भरी
खण्ड-खण्ड प्रस्तर
उजला-उजला परिधान

कैसा अभिप्राय
कैसी निज कल्पना
काजल सा कोमल
चंदन-चंदन
कमल-कमल

पंख लगा
अलमस्त फकीरा

इस छोर से उस छोर तक ।

हाँ मायावी हूँ

हाँ
मायावी हूँ
नही थकता
वंचित भी नही रहता
ज्योत्सना के साथ
खोज लेता
इन्द्र से अवक्रीत
स्वप्न

आख़िर क्या रिश्ता
बे ख़बर
नगर- नयन का ,
किसी
कथा सा
गोल - गोल
संयोग के पार
केवल ए़क नज़ारा ही
काफी होता है

घटाकाश का प्रखर वेग
अन्तः पुर की व्यकुलता दर्शाता ,
कहाँ
फर्क पड़ता मुझे

अनवरत
बरसती आग में
शाही स्नान कर
फ़िर
नई काया धरता

हाँ
मायावी हूँ
नही थकता

यह सत्य नहीं , वह सत्य नही

यह सत्य नही
वह सत्य नही
कैसा अंतर्निर्हित
संभाव्य भेद

विलंबित से द्रुत तक
अस्थायी स्थिति,
अतीत की दृष्टी में
तन्मात्रों का संयोग,


नैसर्गिक नियमों के पार
ठोस विश्वास सा
शब्द संयोजन ,
आर - पार के
अर्थों
का
संतुलन ,

स्वभाव से मुक्त
लय जहाँ
प्रलय है
नियमों के पार
कैसी मुक्ति के उपाय की चर्चा

भवाय , हराय , मृडाय
संग संग
भवतु भव
शिवाय
शिवतराय ।

बुधवार, 26 अगस्त 2009

क्षण भर में

क्षण भर में
पिघलने लगता
धसता आंखों में
हर लहर के साथ
कही और
चाकू सी चुभती नोंक संग
किन्ही गहराइयों में
खो जाता
ये चाँद कैसा ।

सुलगती रेत में

तपती
सुलगती रेत में
पसरा
शिलालेख
करता तुम्हारी प्रतीक्षा

लिखी
जिस पर
कथा
दिशाओं के
विलाप की ।

रणथम्भौर का राजा

हज़ार
दहलिज़े पार कर
चुनौती दे
आकाशीय मेहराबों को
फ़िर लौट आता है

नदी को चीर देता
पर्वत -पर्वत रौंद
आँखों से आग बरसा
आप ही
बनता -बनता है
धारीदार करता
लुकाछिपी
चौकन्ना
चौकाता कैसा
ये रणथम्भौर का राजा ।

कहाँ

कहाँ
विभाजित क्षितिज
कहाँ
विवर्जित माया
कहाँ
नैना सुरत सयानी
कहाँ
अगम
निगम का खेला
कहाँ

बिसर मुक्तिफल जाता
कहाँ
रेखाओ कई महानिद्रा
कहाँ
रंग संग बसेरा
कहाँ
भर
भर कंचन वर्षा
कहाँ
पानी को पानी से धोना
कहाँ
छाव को छाव से अलग करना
कहाँ
आख़िर एसा मेला ।

करवट - करवट

किसी
औघड़ की
काली कमली ओढ़
अपनी ही देह में
अंतरध्यान हो

पल- पल
कैसा सहारा देती है

मौन
के उस
सुरमई
संतुलन को
करवट - करवट ।

मंगलवार, 25 अगस्त 2009

कितना साफ़ ..

पिघलते अंधेरे के पार
गहराई चांदी की रेखा पर
टिके ख्वाब में
बची- खुची पीड़ा तक
या फ़िर
खाली कैनवास में
छिपे पहाडो पर
उगी घास ,

अटक जाता
जहाँ
सूर्य
कभी कभी
कितना साफ़ ।

खोजता पीड पुराणी

खोजता
पीड पुराणी,
माथा - पच्ची कर
कोई न कोई
वैकुंठ की यात्रा कर आता है

सिलखड़ी पर कोर देता
मन्त्रयोग ,
पंच से पंच का तात्पर्य ,
सिद्धांतो के संदेहों से पार
बाटकर सुनहरे बीज
दत्तचित्त हो
अंग और अंगी का
भेद बताता है

कौन बडभागी
ब्रह्मज्ञान की बात करता ,
गुदगुदाता
ज्वारभाटों को ,
विरह के बाणों को
नयनों में समा

आकाश पर मेघ
पृथ्वी पर जल
रहँट पर कौतुहल
बिखेर देता

अखंड ध्यान लयलीन
अपने ही साहिब मै
विख्यात होता है
प्रतिषण
कोई न कोई
खोजता है
पीड़ पुराणी ।

सोमवार, 17 अगस्त 2009

कृष्ण और शुक्ल के मध्य

कृष्ण और शुक्ल
के मध्य
सुझाता
श्रुतज्ञान,

कहाँ
मन मछली गंतव्य
कहाँ
अलबेला ऋतुफल

देखो
अर्ध्य चढाते उन देवताओं को,
भौमश्ववीनि योग में
तरने - तारने को तैयार

दिशाएं शिलाओं पर
सुस्ताती
देहमुक्त महाकाव्य की
उपासनाओं से थकी,
समुच्य का विधान दोहराती है

अभिमान मत करना तुम
सिद्धवस्तु,
जमातों की जमात,
नेत्रों में किरणों के पुंज भर
चढ़ते आकाश पर रहना

हज़ार- हज़ार
सागर की आयु वाले
तुम ही स्कन्द
तुम ही इन्द्र
अग्नि , आकाश,
काल ,यम्,
अमृत
तुम ही हुत,
अथर्व , दत्तरूप,

गरजो
गरजो
रुद्र... बन तुम

कृष्ण और शुक्ल के मध्य
जहाँ
सुझाता कोई
इक और
श्रुतज्ञान ।

शनिवार, 6 जून 2009

रेखाओं की देह विस्तृत होती हैअनन्य रहस्यों को खोलती - बांधती , जोड़ती - तोड़ती , कितना प्रभावित करती हैसमुद्र में लहर , धरती पर नदी , रेत , लम्बी यात्रा हो जातीस्मृतियां रचती - रचाती जीवन की धुरी हो गहराने लगती है , चित्रकार इन्ही रेखाओं को पकड़ रचता है विलय के अर्थ , जाग्रत कल्पनाओं को अपने गंतव्य तक पहुचाता है । आख़िर कहाँ से आती ये रेखायें ... कैसे निपजती , कहते हैं बिन्दु -बिन्दु जुड़ बनती है रेखा , रेखा बनाती है आकृतियाँ , और फिर पूर्ण होते प्रयोजन । सतत एकात्म का खेल चलता है , मूर्त - अमूर्त का एकात्म ।

कितनी सुंदर बात है की रेखाओं का जन्म भी रिक्तता से होता है । रिक्त जो पूर्णता का पर्याय , इसीलिए कभी कभी इन्हे रिक्त की रेखायें कहा जाता है जो अपनी पलकों में गहरी रात के काजल को सहेजकर ख़ुद ब ख़ुद सुर्ख सफ़ेद सतहों के बाहर झाँकती है । वैशाख की तपती दोपहर में पल - पल पके अमलतास के नन्हे निवेदनों को स्वीकार कर कितनी सहजता से उस ' रमते दृग ' के सामने फैला देती अपनी काली कमली ...कभी अनायास ही सुनहरे क्षितिज पर अधलेटी सुनती है गर्म हवाओं का यमनराग तो कभी पीपल के सूखे पत्तों को त्रिताल की संगत देती है । व्यक्त , अनभिव्यक्त के ताने - बानों के बीच खुलने बंधने का क्रम निरंतर जारी रहता है ,कोई उत्सवी परायण आते - आते अपनी ही देह में अंतरध्यान हो ,सुरमई लफ्जों की हामी भर तैलंगी औघड़ के जंतर की मैली डोरी हो जाती है ।

रिक्त की रेखायें करवट - करवट मौन के संतुलन के सहारे अचरज की अटकलों में डूबे पहाड़ पर कौंधती बिजलियों सी आ धमकती है ...बिन बोले ही काँच की बिसतों पर अक्षरों की बुनाई से छूटे अजनबी रेशों के संग अपनी ही सुधि जगा चमकदार फलसफों के पुलिंदों के बीच बहते पानी की उंगलियाँ थामे बूढी यात्राओं के रूखे पगों को नम करती है
। ठीक वैसे ही जैसे कोई स्वत्रन्त्र एकांत टूटी समाधी के पार राग आसावरी के संग विश्वसनीय लगता है / वैसे ही जैसे कोई सुनने सुनाने लगता ईश्वर की बात /वैसे ही जैसे शब्द रोशनाई में नहाकर सौ -सौ फल फलता /वैसे ही जैसे आँखों के सामने बाहर निकल , समुद्रविसर्जित मात्रायें संवाद के अर्थों के साथ अधिक मुखर हो जाती है ,मनमय आभासों के सहारे सब पार प्रकट हो अपने भूले हुए गंतव्य को अर्ध्य देती है ।

रिक्त की रेखायें अपने पंखों को बादलों की ओट में पसार ,मल - मल कर नागकेसर , किसी अन्य उडान को निकल जाती है ...धीरे से ।

मंगलवार, 12 मई 2009

गुरुवार, 30 अप्रैल 2009

जोग जुगत परे

जोग जुगत परे
बातों ही बातों में
कुछ
अगम- अगाध
कुछ
अमाप- अजुणी
कुछ
चौदह लोको में
चवर डुलता है
बिन धरती
बिन बादल
बिन जल
गर्म हवओं का
अनुयायी हो जाता

रटीये नही रटता
काल की चौकी तक ,
कुछ
मुग्ध हो
रेशम
रजनी को
वैराग्य के उस
शतांश की
कथा सुनाता है
जोग जुगत परे
बातों ही बातों में ।

बुधवार, 29 अप्रैल 2009

कथाओं की कथाएँ

कथाओं की कथाएँ

संभावित
कथाओं की कथाएँ
टीस की
उस टपक को
संकेत करती

जहाँ
दिशाएं
समय -असमय
अवस्थाओं की अंगीठी पर
उस नियामक सत्य संग
स्वयं को पकाती है

भीतर ही भीतर
समूचा सा लगने लगता
आप ही सहमत हो
अन्तरस्थ ध्वनि का
अकल्पित वाक्य
अपने होने की
जिद करता है

कथाओं की कथाएँ
अवबोधित
मौन का
संकेत कर
सशरीर ही उसे
अमृत्य का
वरदान देती है।

सोमवार, 20 अप्रैल 2009

रिक्त की रेखायें

रिक्त की रेखायें

रिक्त की रेखायें
गहरी रात के काजल को
अपनी पलकों में सहेजकर
खुद ब खुद
सूर्ख़ सफ़ेद सतहों के बाहर झांकती है,

करवट करवट
मौन के अनन्य संतुलन के सहारे
अचरज की अटकलों में डूबे पहाड़ पर
कौंधती बिजलियों सी आ धमक
वैशाख की तपती दोपहर में
गर्म हवाओं का
यमनराग सुनती है ,
अपने पंखो को
बादलों की ओट में
पसार,
मल -मल कर नागकेसर,
आप ही उत्तपन दिलासाओं
के संग संग
पहचाने रास्ते पकड़ लेती ।

बुधवार, 15 अप्रैल 2009

वैसे ही जैसे

वैसे ही जैसे
शब्द
आँच में पककर
सौ सौ फल फलता,
वैसे ही जैसे
कोई स्वतंत्र एकांत
टूटी समाधि के पार
स्वर संग
धवलतर विस्वसनीय लगता,
वैसे ही जैसे
इक छोटा सा स्वप्न
पतली डोरियों से
ऊँची लहरें बांधता,
गुनगुनाता,
सुनाने लगता ईश्वर की बात,
वैसे ही जैसे
खो जाता कोई
रोशनाई की
रूहानी
रेखाओं में ।

मन ही मन

मन ही मन
लाल त्रिभुज
होने की अटकले लगाता
पहाड़,
कही
दूर निकल जाता
हवा
हामी भर
बिन लहराएँ चली जाती,


पहाड़
फलसफों के पुलिंदे ढोए
अचरज से देखता
वह
गुलमोहर को अपना पंख,
अपना काजल,
दे जाती

पहाड़
बादल की ओठ खोजता
लेकिन
हवा
उसे
कुलधरा ले जाती है

पहाड़
अब अटकले नहीं लगाता
सचमुच
पहाड़ बने रहेने की
धुनी
रमाता है ।

अपनी ही देह में

करवट करवट
किसी
औघड़ की
काली कमली
ओढ़ लेती,

अपनी ही
देह में
अंतरध्यान हो
पल पल
कैसा
सहारा देती,

मौन के
उस
सुरमई
संतुलन को