गुरुवार, 6 जनवरी 2011

वृक्ष संगीत

इक
अनुष्ठान लुभाता है
लगातार
कुछ सीखने-सीखाने का अर्थ
सजीव होता जहाँ
शायद ही कोई
उन अधखुले
आकारों के साथ
अपने हिस्से के
एकांत को
समुद्र संकल्प सा सींचता होगा
साध-साधकर
शब्दों को
पा लेता होगा
महागनय
वृक्ष संगीत
अब तो
औपचारिक प्रार्थनायें भी
ओझल हो चुकी
सहम गयी
उस अनजाने
पलायन से .

इक 
अनुष्ठान लुभाता है 

कश्मीर के पहाड़

मनमाने
मृत्यु उत्सवों में
भाग लेने से
मोक्ष नहीं मिलता
कश्मीर के पहाड़
ऐसा कहने लगे हैं
अरे !
उन्हें अब पाता चला क्या
बात वहीँ की
बहुत पुरानी है .

बस का नहीं उसके

अब तो
सिद्ध हो चुका
पा लिया वरदान
कहीं भी प्रकट होता है
आज बड़ा है
उसका दुःख
स्वयं
ईश्वर से
वह भी थक चुका
बस का नहीं उसके
ये विलाप

शनिवार, 6 नवंबर 2010

पतझड़ - 2

पतझड़
प्रार्थना है
खुली प्रार्थना
फ़ैल जाती जो
संकेतों संग
बादल
चिड़िया
चाँद - सी

तय 
मुकाम तक 

पतझड़ - 1

पलक भर
नींद लेता
समंदर
पतझड़ - साँझ
समा लेती
सुला देती हमें

आखिर
गति
कौन सी
बहतर
पतझड़
या
समंदर

शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

धुआँ होना

झील के भाग्य में
धुआँ होना
होता है
तरकीबें नहीं करती
तरह - तरह की

कभी - कभी
ढोती है
सुनहरे सूरज को
कन्धों पर
नीलांचल की
तितली हो जाने से
पहले 

वह एक ही

वह
ए़क
शब्द
वचन
विषय
मंत्र वर्णन
एक

सूत
निषाद
कुलाल
जरा रहित
सिद्ध
भुवन स्वामी
वह
एक ही

व्यक्त तत्त्व
निर्विकार
अग्नि -सा
ताप
तप
रहस्य
शिवयोगी
वह
एक ही