गुरुवार, 16 फ़रवरी 2012

कुछ मत कहना

कुछ मत कहना
सिवाय
उस मौन के
अनुभूति भरा
कोने - कोने में
फैला
शतप्रतिशत
हमारी अपनी ही
बंद आँखों के
स्पर्श से
जागा
जाना हुआ
मौन !

सोच विचार कर

सोच विचार कर कहना
सतत
स्वयं स्वीकृत जो
अथवा
स्पर्शों के
अनुकरणों की
गरमाहट के पीछे
चलने जैसा कुछ
आज भी
मेरी स्मृतियों में है वह
अतृप्त सहभागी
अन्तराल
सीधे - सीधे
अपने ही अतीत के
शब्दों से तोड़ा गया हो जिसे ,
मैं साक्षी हूँ
तुम्हारे प्रयत्नों का 
"अवस्थाओं के पार जाने के प्रयत्न"
अपने आप पाना है जिसे 
और
कहना कुछ
सोच विचार कर भी
नामुमकिन ।

अधूरा - सा प्रयोग

सिर्फ
प्रयोग करते हैं
जानने का
अधूरा - सा प्रयोग,
अपने ऊपर
गिरते हुए
रंगों से बचने की
कोशिश में
आदिम
छतरीयां तानते हैं,
जी हाँ
कभी - कभी
बहुत भरी पड़ता है
नीति - अनीति से
चिपके रहना,
अविकसित मनोकामनाओं के
भागीदार बनकर
शोरगुल भरे यातायात में
अपनी ही गाड़ी के
पहियों से बनी
रेखाओं को मिटते देखना,
स्वास से स्वास
और
देह से देह के
विछोह का
अनुभव !
अनावश्यक
तुम ऐसा मत करना
मैं तो सिर्फ जागा था
उन स्वप्नों की करवटों में
जहाँ
वृतियों का अस्तित्व भी
अनुपस्थित था
वहीँ
तुम्हे तो किन्ही
अधूरे प्रयोगों के साथ
गहरी
नींद को जानना
बाकी है अभी |

सोमवार, 6 फ़रवरी 2012

देह से देह को

अपने जन्म - सा 
निरुपाधिक ध्यान में 
इस ओर से
उस ओर तक 
वह महापथिक 
पानी से भरे 
थालों पर कदम रख
पार हो जाता है 
अक्षर पुष्प 
धारण कर 
गिटक जाता 
शमशान की अग्नि 
जानता
जीतता भी है 
हर रोज़ 
अपनी ही 
देह से देह को 
हराकर ।

कुछ संकेतों के साथ

कुछ संकेतों के साथ 
जान ही लिया 
उनहोंने 
अपने आप से 
अपरिचित रहने का अंतर 
विवशताओं की 
पदावलियों से परे जो 
आप से आप 
बारी - बारी दौहराया
नि:सृत प्रकाश - सा 
वाकई 
अब केवल 
प्रतीक्षा करनी है 
और करनी 
दोनों को 
प्रार्थनाएँ भी 
कुछ संकेतों के साथ ।

शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

मैं अपने "मैं" से

तुम्हारी उपस्थिति 
कितने ही रहस्यों के 
उदघाटन की बात करती है 
अपनी ही 
पूर्वापेक्षाओं के 
विस्तार का दिव्य
अनुवाद भी 
जहाँ बाकी 
कुछ नहीं रहता 
सब कुछ उसी लय में, 
निश्चय ही 
धीरे - धीरे 
खत्म हो जाते हैं 
सारे अंतर 
विपरीत भाव 
टूटती तन्द्राओं के साथ 
उस आध
निर्विकल्प 
समाधी में रूपान्तरित 
तुम अपनी पूर्णता में 
और 
मैं अपने "मैं" से मुक्त 
यह
वह
तुम और मैं 
अब कहाँ के प्रश्न 
सब कुछ भूलकर 
उस में ही डूबने के गुर 
अक्सर
जहाँ मौन भी 
किसी आवर्तित 
बुलबुले सा हँसता है 
जो उसके मैं  और तुम में 
कभी 
कहीं नहीं था ।

शनिवार, 28 जनवरी 2012

निः संदेह

निः संदेह 
कुछ समझने कि इच्छा 
ना करना ही 
उनके लिए सबसे बड़ा 
आश्रय है 
हज़ार मनकों को 
पिरो - पिरोकर 
सन्यास का अधिकारी हो जाना 
शायद उससे भी कहीं ज्यादा 
या फिर 
"प्रारब्ध" जैसे शब्दों के प्रयोग 
ठीक - ठीक जाना आपने 
बात उतनी भी आसान नहीं 
आवरणों को हटाकर 
ज्यूँ कि त्यूँ 
स्वयं ही 
उन स्वपन अनुभवों को 
खीचकर 
अपने नित्यमुक्त होने कि 
उदघोषणाओ के उत्सर्गों को 
जुटाने जैसी 
अक्षरश:
गतागतं सत्य जो 
निः संदेह |