सोमवार, 28 जुलाई 2014

मौन 1,2,3

मौन 1 

युगों-युगों से 
शब्द छोटे रह जाते हैं 
वस्तुतः 
डूब ही जाते वे 
मौन के उस महासागर में ।   


मौन 2 

समय के ठहर जाने पर 
वाणी के अर्थ नहीं रह जाते 
सिर्फ दृष्टि ही काफी होती जहाँ 
असल पाने को 
मन का अहंकार राख़-सा झर जाता 
मौन के सुरमयी समागम में। 

मौन 3 

कोरी 
गहरी चुप्पी नहीं 
मौन ! मन को मानने का 
अतीन्द्रियदर्शी सुकोमल अनुभव है। 

परिशुद्ध शब्द

परिशुद्ध शब्द

ध्वस्त करने उस पूर्व-संचित 
संदेह की देह को 
अपना वास्तविक अर्थ पाकर 
सीधे ही उतरते हैं 
स्वयं प्रमाणित शब्द, 
ऋषियों की 
अनगिनत यात्राओं के साक्षी 
अनुभव भरे ये 
पावन परिशुद्ध शब्द ।

स्वपन साक्षी

स्वपन साक्षी 



जागृति में केवल 
उपस्थिति है 

स्वपन में  
साक्षी होने की नियति
सच वहाँ तो 
स्वयं के होने का स्वयं ही 
दृष्टा होना है ।

रविवार, 20 जुलाई 2014

ऋत के रंग

ऋत के रंग  
ऋत ही इस सृष्टि कि असल सनातन लय है। उस सजीव सत्य का पर्यायवाची, जिसके होने के अपने उद्देश्य औरनिर्धारित आधार हैँ, यही वह महत्तर तत्व है जिसके कारण तमाम चेतन - अचेतन धाराओं के बीच निर्वर्तित समभाव सुनिश्चित है। यक़ीनन ऋत एक ऐसे सामञ्जस्य कि चदरिया है जिसमे निसर्ग का अंश- अंश तानेबाने - सा रचाबुना है।उसकी अटल धुरी के सहारे हि यह समस्त भव और उसका स्वभाव गतिमान है। 

हज़ारों हज़ार बरसों से हम ऐसे हि ऋत की उपासना करते आये हैं। ऋगवेद, उपनिषद तथा पुराणोँ में जिसकि संवित संज्ञाएँसम्मिलित हैँ, उस "ऋतम्" शब्द की वास्तविक अनुगूँज इस सम्पूर्ण सत्ता पर कही गयी सुन्दर कविता - सी मालूम पड़तीहै। एक तरफ ऋत को जहाँ सत्य कहा गया है तो वहीँ सत्य को जीवन का अमूल्य 
तत्व, वस्तुतः ऋत अनेक अर्थोंवाली अभिव्यक्त जीवन रचना है जिसमें कितना कुछ परत दर परत 
अन्तर्निहित है।  

ऋत के अपने रंग हैं और अपना संगीत भी, जिसके दोहरे अर्थ कई - कई स्तरों पर स्वयं को प्रकट कर उच्चतर संवाद रचतेदीखते हैं। उसके अनन्य आयामों का उल्लेख किया जाना बहुत कठिन है लेकिन सहृदयी अनुभूति अत्यन्त सहज, उसका सुकोमल स्पर्ष सहसा हि उसकी दिव्य उपस्थिती का प्रमाण है। ऋत के परिकर में 
मानो पूरा का पूरा जगत चलायमान हैऔर हम मनुष्य भी उसकी इस गति के सूक्ष्म अंश भर हैँ, वास्तव में उसेपाना अथवा उसमे समाना अपने आप में एकविशिष्ठ अवस्था की तरफ संकेत है जहाँ उस अनादि लय के 
साथ अभिन्न संगत होना किसी अलौकिक अनुभव से कमनहीं, ये सब अनुभूतियों की बात है प्रत्यक्षानुभूतियों के भी आगे की बात। 

देश - काल भी इसी ऋत के अधीन है, वे भी उसके संग समन्वय की संगत करते नज़र आते हैं, हर क्षण अपने आप कोप्रासंगिक नवीनता से भरकर सजीवता से उस सर्वोच्य महापथ की ओर आशा भरी निगाहों से देखते हैं,जिसका अनुक्रमसदैव शुभकारी है। परोक्ष-अपरोक्ष परिवर्तन उसी ऋत का सौन्दर्य है सही मायनों में वह उसका जन्मजात गुणधर्म जानपड़ता है।ज्ञात - अज्ञात, ज्ञेय - अज्ञेय, नित्य - अनित्य, सत्य - असत्य जैसे तमाम तत्व उसकी ही तीख़ी धार पर स्वयं को परखते हैं। शायद इसी के इर्दगिर्द वह प्राण, अथवा चेतना सरीखी शक्ति संचालित है या यूँ कहें की उनकी गति भी ऋत में निहित है। 

अब सवाल यह उठता है कि ऋत का अधिष्ठा कौन है, आखिर उसके रंगों को कौन भरता है, कौन गढ़ता है उसकी काया,कितने ही देवता ऋत के नियंता होने का दावा भर करते है लेकिन वे भी उस लय का हिस्सा भर है, 

ऋत को धारण करनासाक्षात ऋत होना है, सत्य होना है, सम होना है। 

                                                         
                                                          अमित कल्ला  
                                                                                                                        जयपुर 

सोमवार, 16 जून 2014

विश्वरूप

दोनों ही उस आकाश के
परपार हो जाते हैं
पलक शून्य दृष्टि संग
उसी एक लय में थिर,
यकायक
अपनी ही गति के विपरीत
सचेतन धारण करने लगते
कुंडलिनी के गर्भ में
उस विश्वरूप को। 

अज्ञात को ख़त

अज्ञात को ख़त एक असल स्वीकृति है, निश्चित ही उस अनदेखे पर जताया गया गहरा विश्वास, यक़ीनन उसकी उपस्थिति ही उसकी सज्ञान अनुमति का ज्ञातमय स्वरुप है जो इन असंख्य नामरूपों में किसी दिव्य कविता सी अपने होने को सार्थक करती है और अपने न होने के अस्तित्व को जग विक्षोभ से सिलसिलेवार मुक्त।

हमारे यहाँ अज्ञात के कई अर्थ व उपमाएं हैं कई तरहों कि वैचारिक धाराओं के प्रवाह से उसका सीधा सरोकार भी स्पस्ट दिखायी पड़ती है जो हमेशा ही अपनी नैसर्गिक सार्थकता के साथ देश - काल कि सीमा सत्ताओं पर अपने गहरे हस्ताक्षर उकेरते हैं। हम सभी के लिए जिन्हे पाना और पाकर खोना दोनों ही किसी रोमांच से कम नहीं, वे इस जीवन यात्रा का न केवल गहन हिस्सा भर हैं बल्कि समूचा भव उनके ही इर्दगिर्द रचाबुना तानाबाना है।
अज्ञात का अपना संगीत है, उसके रंग, उसकी रेखा, उसका आकार है, उसकी अपनी लय भी है जिसका सीधा सम्बन्ध हमारे मनोमय भावों संग अत्यंत बारीकी से जुड़ा है, अज्ञात वास्तव में आविष्कार या किसी अन्वेषण का रूपक ही जान पड़ता है, सुनहरे रुपहले भविष्य को छूता टटोलता।
जी हाँ इस मुल्क कि माटी का कण-कण भी ऐसे ही अज्ञात का मुरीद है, मार्गी और देसी दोनों ही धाराओं में जो सहसा उपस्थित है, ऋषि भृगु, नचिकेता, उद्दालक से लेकर हमारे कबीर, नानक, नामदेव, तुका, चोखा अथवा निवृति सभी किसी न किसी रूप में उसी अज्ञात को ज्ञात होता पाते हैं, सूफ़ी संतों के यहाँ तो उसका ताल्लुख और ज्यादा गहराता दीखता है, फ़कीरों, दरवेशों के काफ़िले उसी एक अज्ञात के दीदार को खोजते फिरते नज़र आते हैं.……।


ऋत अर्थात सृष्टि की वह सनातन लय जिससे अंश - अंश चलयमान है जो सत्य का साक्षात प्रतिनिधित्व है यह अमूल तत्व भी उस अज्ञात के फेरे से अछूता नहीं है। हमारे लिए बहुत – सा सत्य ज्ञात और अज्ञात के बीच मौजूद है जिसे दर्शन की भाषा में प्रमाण भी कहा जा सकता है जिसमे बड़े पैमाने पर यूनिवर्सल ट्रुथ सम्मिलित है।  जैसे, अगर हम विज्ञान को ज्ञातज्ञान का सबसे बड़ा आधार माने तो दिन और रात की निजता पर बड़े सवाल किये जा सकते हैं, विज्ञान के अनुसार सूर्य का उदय और अस्त होने की प्रक्रिया से कोई सरोकार नहीं है वहाँ ना तो रात है और ना दिन, लेकिन हमारे लिए उनके मायने हैं, निसर्ग में उनकी अपनी एक सत्ता है जिसे हम कंडीशनल ट्रुथ के रूप में सहज स्वीकार करते हैं। 

बृहदारण्यक उपनिषद और अवधूत गीता जहाँ उस आत्मतत्व के सम्बन्ध में " न इति " माने नेति नेति  कहती है तो वहीं बौद्ध मान्यताएँ उसे महाशून्य के रूप में उस अज्ञात की काया के रूप में परिभाषित करती है। यह अपने आपमें एक अत्यंत रोचक विषय है और उससे संवाद करके व्यक्तिगत अनुभव के स्तर पर अर्थ कायम करना एक बड़ी चुनौती जान पड़ता है जहाँ भ्रमित होने की संभावनाएं कहीं ज्यादा है क्योंकि वह प्रत्यक्ष, अनुमान और परंपरागत प्रमाणों से परे ही है, हाँ शब्दप्रमाण में उस व्याख्या की व्यंजना जरूर मापी जा सकती है। 

अक्सर रचनाकार अपने अनुभव व स्मृतियों के आधार पर सृजन यात्रा में आगे बढ़ते दीखते हैं जिनकी कल्पनाओं का कैनवास दृश्यगत विस्तार की सीमाओं को छूने के बावज़ूद भी किसी न किसी रूप में सिकुड़ा रह जाता है, वे संकुचित परिकर की दहलीज़ों को नहीं लाँघ पाते लेकिन उस अज्ञात की स्तुति उससे किये गए सुकोमल संवाद, उसको लिखा गया हर एक खत निश्चित तौर विचारशीलता के सार्थक सोपान रचने में सहयोगी होता है। अनायास गठित आकृतियां जब अपने आपको रेशा रेशा खोलती हैं अपनी ज्ञात काया के निकाय को उसी अज्ञात में पूरा होता पाती है जो अपने आपमें उसकी सम अवस्था की पूर्णता की ओर गहरा इशारा है। 

अज्ञात का संग उस वास्तविक पूर्णता का पर्याय है जिसे हम सभी अलग अलग नाम रूपों में पाने को प्रयासरत रहते हैं जिसका रास्ता ज्ञात से होकर ही गुज़रता है, ये ठीक वैसा ही है जैसे साकार में निराकार निहित होता है। आदिशंकराचार्य द्वारा लिखित दृगदृश्य विवेक में ऐसे तमाम मसलों पर बड़ी सटीक विवेचना की गयी है दृष्टा और दृश्य के बीच के उस सम्बन्ध की सार्थकता पर प्रकाश डाला गया है जिसमें उस अज्ञात के अंश ज्ञात तत्व में स्थायी भाव से वास करते हैं । अज्ञात का सौंदर्य भावातीत है, मौन की मात्राएँ उसके अंतर संगीत के स्वर हैं, कभी कभी उसकी उपस्थिति बूंद बूंद संवित विकल्प सी जान पड़ती है, ज्ञात ही उस अज्ञात का सम साक्षी है ।  


अमित कल्ला                           amitkallaartist@gmail.com

शनिवार, 8 मार्च 2014