कितनी
लम्बी होती जाती
तिरते स्वप्नों कि
छायाँ
अकारण ही नहीं
ख़बरदार करता है,
आसमान का टुकडा
तितली सा
अर्थ बदल,
गर्भ के अहाते तक
देख सकता
आकार
भव का
कभी कम
कभी ज्यादा
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रविवार, 13 सितंबर 2009
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