सत्य
दीखता नहीं
सुनाई भी नहीं देता
लिखा जाता होगा
शायद
रहता होगा
सहस्त्रों निवेष्टों मध्य
बस यथाशक्ति
खोजते रहो
खोजते रहो उसे
निक्षिप्त शब्दावलियों में
कहीं
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गुरुवार, 24 सितंबर 2009
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