आते आते
कहीं गुम
कुछ
अनभिव्यक्त रह जाता है,
आँखे,
चकोर बन
पीना चाहती
आपनी ही बिछाई रे़त पर
लहर सी पसर
शब्द सुगंध में...
करती
अहंकार !
विसर्जन
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सोमवार, 14 सितंबर 2009
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