रह-रह कर
गुजर जाता
पकड़ में नहीं आता
सहसा
वर-सुन्दरी के
स्वप्न सा
भीतर ही भीतर,
यादों की तमाम तसीरें
उस एकांतिक
आलिंगन के साथ
दिशाओं के अहातों तक
रख देती कदम,
रंगबिरंगे ताने-बाने से
जुटाती
लिपिबद्ध
मन्द स्वरों के
अर्थ,
अपने
आवरण के साथ
साँस दर साँस
टुकड़े टुकड़े हो
पल-पल
कैसे निभता
सूर्यकांतमणि का
इंतजार
सूर्यकांतमणि का इंतजार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सूर्यकांतमणि का इंतजार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मंगलवार, 15 सितंबर 2009
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
