शनिवार, 28 जनवरी 2012

निः संदेह

निः संदेह 
कुछ समझने कि इच्छा 
ना करना ही 
उनके लिए सबसे बड़ा 
आश्रय है 
हज़ार मनकों को 
पिरो - पिरोकर 
सन्यास का अधिकारी हो जाना 
शायद उससे भी कहीं ज्यादा 
या फिर 
"प्रारब्ध" जैसे शब्दों के प्रयोग 
ठीक - ठीक जाना आपने 
बात उतनी भी आसान नहीं 
आवरणों को हटाकर 
ज्यूँ कि त्यूँ 
स्वयं ही 
उन स्वपन अनुभवों को 
खीचकर 
अपने नित्यमुक्त होने कि 
उदघोषणाओ के उत्सर्गों को 
जुटाने जैसी 
अक्षरश:
गतागतं सत्य जो 
निः संदेह |

शुक्रवार, 9 सितंबर 2011

छू -- कर

अंतर 
दोनों में 
आजीवन ,
लौटने 
लौटाने जैसा
बादल 
या 
पहाड़ 
छोटे हो जाते 
दोनों ही 

छू -- कर
जहाँ | 

दूर की बात

बिना 
उलट - पुलट 
सूरज भी 
धीरे से 
स्वीकार लेता 
वह सत्य 
जिससे आँखे मूंद लेते हम 
सहज सरोकार है 
उसका 
हमारा अनुराग तो 
यदाकदा वाला ही 
न रहने पर 
कभी स्पष्ट नहीं रहने जैसा 
स्वीकारना तो उसे 
जैसे 
दूर की बात |

रविवार, 4 सितंबर 2011

असंभव लगता

असंभव 
लगता
कह पाना 
यूँ मानो 
अपने आप को 
दोहराता हुआ 
देह से भिन्न 
कोई आस्वादन, 
सत्य के
अनुकरण में 
क्या इतना कुछ 
काफी नहीं,
या फिर 
इसका उल्टा 
साल दर साल 
किसी का 
अनुयायी 
बने रहना 
शायद 
असंभव ही |

शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

सीख रहा हूँ

बादलों की
प्रदक्षिणा से
सीख रहा हूँ
द्वन्दरहित
अंतहीन
भिगोने की कला

क्या
इस अनुभूति में
अंतर्लीन होना
साक्षात्कार की
सहमती है

या फिर
थाह
किन्ही
कल - कल
स्मृतियों की |

मंगलवार, 30 अगस्त 2011

अपना स्वर्ग - नर्क


अभी
कुछ और भी
साझा करना है
गहरी नींद से पहले
उन चुप्पियों को
गिटक लिया था जिन्हें कभी
हवाओं का
बहाना बनाकर
साझा करना है
अंतर्मन
अपना स्वर्ग - नर्क
संभवत:
बुद्धि मुक्त
व्यवहारों के
व्यापारों को

सोमवार, 29 अगस्त 2011

मैं शब्दों की पगडण्डी

डरता हूँ
सहानुभूतियों से
सुहाता नहीं अब
थाली में परोसा
स्नेहमय व्यवहार,
मठ को
त्यागते समय
आश्चर्य से
देखते रहे
परम्पराओं से बंधे
सन्यासी,
कहकर आया था उन्हें
कि
लौट जाओ
तुम सब अपनों में
मैं
शब्दों की
पगडण्डी
पकड़ता हूँ |