सोमवार, 6 फ़रवरी 2012

कुछ संकेतों के साथ

कुछ संकेतों के साथ 
जान ही लिया 
उनहोंने 
अपने आप से 
अपरिचित रहने का अंतर 
विवशताओं की 
पदावलियों से परे जो 
आप से आप 
बारी - बारी दौहराया
नि:सृत प्रकाश - सा 
वाकई 
अब केवल 
प्रतीक्षा करनी है 
और करनी 
दोनों को 
प्रार्थनाएँ भी 
कुछ संकेतों के साथ ।

शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

मैं अपने "मैं" से

तुम्हारी उपस्थिति 
कितने ही रहस्यों के 
उदघाटन की बात करती है 
अपनी ही 
पूर्वापेक्षाओं के 
विस्तार का दिव्य
अनुवाद भी 
जहाँ बाकी 
कुछ नहीं रहता 
सब कुछ उसी लय में, 
निश्चय ही 
धीरे - धीरे 
खत्म हो जाते हैं 
सारे अंतर 
विपरीत भाव 
टूटती तन्द्राओं के साथ 
उस आध
निर्विकल्प 
समाधी में रूपान्तरित 
तुम अपनी पूर्णता में 
और 
मैं अपने "मैं" से मुक्त 
यह
वह
तुम और मैं 
अब कहाँ के प्रश्न 
सब कुछ भूलकर 
उस में ही डूबने के गुर 
अक्सर
जहाँ मौन भी 
किसी आवर्तित 
बुलबुले सा हँसता है 
जो उसके मैं  और तुम में 
कभी 
कहीं नहीं था ।

शनिवार, 28 जनवरी 2012

निः संदेह

निः संदेह 
कुछ समझने कि इच्छा 
ना करना ही 
उनके लिए सबसे बड़ा 
आश्रय है 
हज़ार मनकों को 
पिरो - पिरोकर 
सन्यास का अधिकारी हो जाना 
शायद उससे भी कहीं ज्यादा 
या फिर 
"प्रारब्ध" जैसे शब्दों के प्रयोग 
ठीक - ठीक जाना आपने 
बात उतनी भी आसान नहीं 
आवरणों को हटाकर 
ज्यूँ कि त्यूँ 
स्वयं ही 
उन स्वपन अनुभवों को 
खीचकर 
अपने नित्यमुक्त होने कि 
उदघोषणाओ के उत्सर्गों को 
जुटाने जैसी 
अक्षरश:
गतागतं सत्य जो 
निः संदेह |

शुक्रवार, 9 सितंबर 2011

छू -- कर

अंतर 
दोनों में 
आजीवन ,
लौटने 
लौटाने जैसा
बादल 
या 
पहाड़ 
छोटे हो जाते 
दोनों ही 

छू -- कर
जहाँ | 

दूर की बात

बिना 
उलट - पुलट 
सूरज भी 
धीरे से 
स्वीकार लेता 
वह सत्य 
जिससे आँखे मूंद लेते हम 
सहज सरोकार है 
उसका 
हमारा अनुराग तो 
यदाकदा वाला ही 
न रहने पर 
कभी स्पष्ट नहीं रहने जैसा 
स्वीकारना तो उसे 
जैसे 
दूर की बात |

रविवार, 4 सितंबर 2011

असंभव लगता

असंभव 
लगता
कह पाना 
यूँ मानो 
अपने आप को 
दोहराता हुआ 
देह से भिन्न 
कोई आस्वादन, 
सत्य के
अनुकरण में 
क्या इतना कुछ 
काफी नहीं,
या फिर 
इसका उल्टा 
साल दर साल 
किसी का 
अनुयायी 
बने रहना 
शायद 
असंभव ही |

शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

सीख रहा हूँ

बादलों की
प्रदक्षिणा से
सीख रहा हूँ
द्वन्दरहित
अंतहीन
भिगोने की कला

क्या
इस अनुभूति में
अंतर्लीन होना
साक्षात्कार की
सहमती है

या फिर
थाह
किन्ही
कल - कल
स्मृतियों की |